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Saturday, 30 December 2017

'सृष्टि सम्मत नहीं जनवरी से शुरू होने वाला नया वर्ष

ओ3म:
एक जनवरी से शुरू होने वाला नया वर्ष सृष्टि सम्मत नया वर्ष नहीं है। वैदिक गणना के अनुसार हमारा नववर्ष चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। उसी दिन से हमारें यहां चैत्रमाह का नवरात्र पर्व शुरू होता है। एक जनवरी से शुरू होने वाला नया वर्ष ईसाई मत के मानने वालों के लिए नया वर्ष होता है । अन्य धर्म मानने वालों के लिए यह नया वर्ष नहीं होता है। इसके लिए सभी मत-मतांन्तरों के नये वर्ष की तिथियां अलग-अलग निर्धारित हैं। अब चूंकि विश्व के अधिकांश भाग में काफी से ईसाई मत के मानने वालों का प्रभुत्व चला आ रहा है। इसलिए वर्ष की गणना इसी दिन से शुरू होती है लेकिन यह वैदिक गणना के अनुसार सही नहीं है। ईसाई मत के मानने वालों का यह वर्ष 2018 है जबकि वैदिक गणना सृष्टि काल से चली आ रही है। सृष्टि की उत्पत्ति का 1968053118 वां वर्ष प्रारम्भ  होगा। आइए इस पर सिलसिलेवार प्रकाश डालें।
वेदों की उत्पत्ति में कितने वर्ष हो गए हैं, इस सवाल के जवाब में आया है कि एक वृन्द छानवे करोड़, आठ लाख, बावन हजार,नौ सौ छिहत्तर अर्थात 1968053118 वर्ष वेदों की और जगत की उत्पत्ति में हो गए हैं। यह कैसे निश्चय हो कि अतने ही वर्ष और वेद और जगत की उत्पत्ति में बीत गए हैं, इस सवाल पर विचार करने के बाद यह जवाब आया कि यह जो वर्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें वैवस्वत मनु का वर्तमान है। इससे पूर्व छह मन्वन्तर हो चुके हैं। ये मन्ववन्तर हैं:- 1.स्वायम्भव, 2.स्वारोचिष, 3.औत्तमि, 4.तामस, 5.रैवत, 6. चाक्षुष और सातवां वैवस्वत मनु वर्त रहा है। सावर्णि आदि सात मन्वन्तर आगे भोगेंगे। ये सब मिलके 14 मन्वन्तर होते हेँ। और एकहत्तर चतुयुर्गियों का नाम मन्वन्तर धरा गया है। सो उसकी गणना इस प्रकार से है कि 17,28,000 यानी सत्रह लाख अ_ाइस हजार वषों का नाम सतयुग रख है। 12,96000 यानी बारह लाख छानवे हजार वषों का नाम त्रेता 8,64000 अर्थात आठ लाख चौसठ हजार वषों का नाम द्वापर और 4,32,000 अर्थात चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का नाम कलियुग रखा गया है। आर्यो ने एक क्षण और निमेष से लेके एक वर्ष पर्यन्त भी काल की सूक्ष्म और स्थूल संज्ञा बांधी है। इन चारों योगों के 43,20,000 तितालिस लाख बीस हजार वर्ष होते हैं। जिनका चतुर्युगी नाम है। एकहत्तर चतुर्युगियों के अर्थात 30,67,20,000 तीस करोड़, सरसठ लाख और बीस हजार वर्षों की एक मन्वन्तर संज्ञा की है और ऐसे छह मन्वन्तर मिलकर 1,84,03,20,000 एक अरब,चौरासी करोड़, तीन लाख और बीस हजार वर्ष हुए और सवातवें मन्वन्तर के भोग में यह अटठाइसवीं चतुर्युगी है।
इस चतुर्युगी में कलियुग के 4,976 चार हजार नौ सौ छिहत्तर वर्षों का तो भोग हो चुका है और बाकी 4,27,024 चार लाख सत्ताइस हजार चौबीस वर्षों का भोग होने वाला है। जानना चाहिए कि 12,05,32,976 बारह करोड़, पांच लाख, बत्तीस हजार, नौ सौ छिहत्तर वर्ष तो वैवस्वत मनु के भोग हो चुके हें और 18,61,87,024 अठारह करोड़, एकसठ लाख, सत्तासी हजार चौबीस वर्ष भोगने के बाकी रह गए हैं। इनमें से यह वर्तमान 77 सतहत्तरवां है, जिसको आर्य लोग विक्रम का 1933 उन्नीस सौ तैंतीसवां संवत कहते हैं।
जो पूर्व चतुर्युगी लिख आए हैं, उन एक हजार चतुयुर्गियों की ब्राम्हदिन संज्ञा रखी है और उतनी ही चतुयुॢगयों की रात्रि संज्ञा जानना चाहिए। सो उत्पत्ति करके हजार चतुर्युगी पर्यन्त ईश्वर इस को बना रखता है। इसी का नाम ब्राह्म दिन रखा है। और हजार चतुर्युगी  पर्यन्त सृष्टिको मिटा के प्रलय अर्थात कारण में लीन रखता है। उसका नाम ब्राह्मरात्रि रखा है। अर्थात सृष्टि के वर्तमान होने का नाम दिन और प्रलय का नाम रात्रि है। यह जो वर्तमान ब्राह्मदिन है इसके 1,96,08,52,976 एक अरब छानवे करोड़, आठ लाख, बावन हजार नौ सौ छिहत्तर वर्ष इस सृष्टि की तथा वेदों की उत्पत्ति में भी व्यतीत हुए हैं और 2,33,32,27,024 दो अरब तैंतीस करोड़, बत्तीस लाख, सत्ताइस हजार चौबीस वर्ष इस सृष्टि को भोग करने के बाकी रहे हैं। इनमें से अन्त का यह चौबीसवां वर्ष भोग रहा है। आगे आनेवाले भोग के वर्षों में से एक एक घटाते जाना और गत वर्षों में क्रम से एक एक वर्ष मिलाते ेजाना,जैसे आज पर्यन्त घटाते बढ़ाते आए हैं। शंका समाधान के लिए आर्य समाज सूरजपुर के पूर्व प्रधान पं. महेन्द्र कुमार आर्य से सम्पर्क किया जा सकता है।
पं.महेन्द्र कुमार आर्य, पूर्व प्रधान, आर्य समाज सूरजपुर।
फोन-9910550037

Saturday, 2 December 2017

अयोध्या में बाबरी मस्जिद कैसे आई?

आर्य समाज सूरजपुर के दो दशकों तक प्रधान रहे पं. महेन्द्र कुमार आर्य ने आजकल देश में अयोध्या में राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद मुद्दे पर गरमागरम बहस पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि यह इतिहास का प्रश्न है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद कैसे आई? उन्होंने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि भारतवर्ष आर्यों का देश हैं और महर्षि दयानंद इसे आर्यावर्त कहते थे, जो कि इसका पुरातन नाम था। यही नहीं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को भी आर्य कहा जाता था। हमारे इतिहासकारों ने खोज निकाला है कि श्रीराम का इतिहास 1 करोड़ 81 लाख वर्ष पुराना है तब तो इस्लाम धर्म का कोई अता-पता ही नहीं था। इस्लाम धर्म मात्र 1450 वर्ष पुराना है। इसके बाद ही अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनी होगी तो फिर इससे पूर्व वहां पर क्या था? इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद कैसे बननी चाहिए। वहां तो श्रीराम का स्थान है ।
वर्तमान समय में केन्द्र सरकार और उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकारों के सत्तासीन होने के बावजूद इस तरह के प्रसंग के चलते अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए श्री आर्य ने कहा कि भाजपा की नीयत में खोट लग रहा है। वह इसे केवल वोट की राजनीति के लिए जिंदा रखना चाहती है। वह अयोध्या में मंदिर नहीं बनवाएगी। ऐसे में हिन्दू समाज को जागृत होना चाहिए।


नोट: ये आर्य विचारक श्री आर्य के अपने निजी विचार हैं। इस बारे में किसी प्रकार के संशय होने पर सवाल जवाब उनके मोबाइल नं.9910550037 पर संपर्क करके किया जा सकता है।

बेशक विशुद्ध हिन्दू है राहुल गांधी

हमारी पुरातन संस्कृति ही वसुधैव कुटुम्बकम की है। जो भी हमारे पास आया, उसे हमने अपनाया और उसे अपने रंग-ढंग में बदल दिया । हमारे यहां यह कहावत है कि गंगा के पास जो भी आया वह गंगा मय हो गया। कहने का मतलब गंगा में छोटी-मोटी नदियां भले मिल जाएं लेकिन गंगा गंगा रहतीं हैं। विश्व प्र्रसिद्ध प्रयाग है जहां यमुना और सरस्वती जैसी नामचीन नदियों का मिलन होता है लेकिन इसके आगे कोई गंगा-जमुना और सरस्वती नहीं कहता बल्कि उसे गंगा ही कहा जाता है। इसलिए इंदिराजी महान हस्तीं थी उन्होंने अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप इस्लाम और क्रिश्चियन धर्म दोनों को अपने में समाहित कर लिया। उसी इंदिरा के पौत्र राहुल गांधी हैं।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को कोई मुसलमान और कोई क्रिश्चियन बता कर उनका मजाक भले ही उड़ा रहा हो लेकिन यदि इस बात पर गंभीरता से विचार करके देखा जाए तो राहुल गांधी आज भी विशुद्ध हिन्दू हैं या कहिये कि शत-प्रतिशत हिन्दू हैं। राहुल गांधी की दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने फिरोज गांधी से शादी की थी न कि फिरोज खान से । उन्होंने शादी करने के लिए इस्लाम धर्म भी नहीं अपनाया था वह मरते दम तक इंदिरा हीं रहीं। शादी के लिए फिरोज को गांधी का टाइटल स्वीकार करना पडा था। इसके बाद दोनों अपनी मर्जी से जीवन व्यतीत किया। इसी तरह राहुल गांधी के पिताश्री राजीव गांधी ने भी क्रिश्चियन धर्म नहीं अपनाया। विदेश में Edvige Antonia Albina Maino को अपनी पत्नी बनाकर भारत लाए और उनका नाम सोनिया गांधी रखा गया और इंदिरा गांधी ने उन्हें अपनी बहू के रूप में अपनाया। उसी तरह सोनिया गांधी ने भी भारत को अपनाया। यही अपनी संतानों के नाम क्रिश्चियन धर्म के अनुरूप नहीं हिन्दू संस्कृति के अनुरूप प्रियंका और राहुल रखे। 

Thursday, 16 November 2017

भाजपा फिर राम की शरण में क्यों?

भारतीय जनता पार्टी के तारनहार और पालनहार भगवान श्रीराम ही हैं। यही ब्रह्मास्त्र उठाकर भाजपा फिर से गुजरात और यूपी की चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव आसानी से निकालने के बाद जब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भाजपा के सुपरस्टार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनके गढ़ गुजरात में घेरा ही नहीं बहुत हद तक घुटनों के बल बैठने को विवश कर दिया। कांग्रेस ने भाजपा नेतृत्व वाली मोदी सरकार की दुखती रग नोटबंदी और जीएसटी और आर्थिक महामंदी  पर हाथ रखते हुए उसे जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा कर दिया तो पहले पहल भाजपा नेताओं ने इधर-उधर की बातें कर जनता का दिल बहलाने की कोशिश की लेकिन इसके बाद जब उनकी एक न चली तो जीएसटी की गलती मानते हुए उस पर धीरे-धीरे यू टर्न लेना शुरू कर दिया हे। अब जब जनता की अदालत में अपनी गलती मानने के बाद यह पता चला कि इस बार जनता का रुख भाजपा की ओर से हट रहा है तो फिर से वह अयोध्या में रामलला की शरण में आ गई है। अब गुजरात और यूपी के निकाय चुनाव के लिए भाजपा ने श्रीराम के चरणों को कस कर पकड़ लिया है। आजकल श्री श्री रविशंकर को राम मंदिर की याद अचानक आ गई है। जानकार सूत्रों का मानना है कि रविशंकर अपने आप राम मंदिर सुलझाने नहीं जा रहे हैं और न ही वह सुलझा पाएंगे। यह बात सभी जानते हैं तो फिर इस बात का ढिंढोरा क्यों इतना पीटा जा रहा है। इसका एक ही कारण समझ में आ रहा है कि एक तीर से कई शिकार करने वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए भाजपा अयोध्या के श्रीराम के नाम की माला इसलिए जप रहीं है इससे जहां यूपी के निकाय चुनाव आसानी से पार हो जाएंगे वही गुजरात के विधानसभा के चुनाव भी निकल जाएंगे। अगले 12 दिनों में यूपी के निकाय चुनाव संपन्न होने जा रहे हैँ तब तक यहां की जनता को रामधुन में मस्त रखने का कार्यक्रम भाजपा ने बनाया है और हिन्दू वोटों के धु्रवीकरण के लिए इससे अच्छा और कोई मुद्दा नहीं हो सकता है। इसके अलावा गुजरात में भी भगवान राम बेड़ा पार लगाएंगे। वहां मतदान 9 और 14 दिसम्बर को होने जा रहे हैं। राम मंदिर मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 5 दिसंबर से शुरू होने जा रही है। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ढांचे के ध्वंस कांड की वर्षगांठ दोनों पक्षों द्वारा अपने-अपने तरीके से मनाई जाती है। इसका उद्देश्य हिन्दू और मुसलमानों को अपना-अपना वजूद याद दिलाना होता है। छह दिसंबर के दो दिन बाद ही गुजरात में पहले चरण के मतदान होने हैं। इसके बाद 14 दिसंबर तक इस लहर को बनाई रखी जाएगी। 

Thursday, 2 November 2017

बहुत ही छोटे कद के नेता निकले कमल हासन

राजनीति में शार्टकट से चौके-छक्के मारने के इरादे से अभिनेता कमल हासन ने हिन्दू आतंकवाद की चर्चा करके अपना नेता वाला कद काफी छोटा कर लिया है। शायद उन्हें यह भी नहीं मालूम कि वेदों और पुराणों के जमाने से हिन्दुओं में यह परम्परा चली आ रही है कि प्राणरक्षा के लिए शस्त्र उठाना पाप नहीं है। रामायण,महाभारत काल से पहले भी अनेकोंं ऐसी घटनाएं हुईं हैं जब महान हस्तियों में राजाओं ने ही नहीं बल्कि ऋषियों ने भी आवश्यकता पडऩे पर और प्राण रक्षा के लिए शस्त्र तक उठाए हैं। इसे यदि आप हिन्दू आतंकवाद कहते हैं तो ये आपकी नादानी है। शायद इस तरह के शगल करके सीधे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हों तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है। आज पूरा हिन्दुस्तान हिन्दुओं के पक्ष में एक हो रहा है। ऐसे में कमल हासन साहब आपकी यह ओछी मानसिकता और फूट डालो राज करो की रणनीति सफल होने वाली नहीं है। आज का भारतीय हर एक बात को अच्छी तरह से जानता है। अपने नेताओं को ऐसी पटकनी देता है कि वह उठने के काबिल भी नहीं रहते हैँ।
कमल हासन साहब की यह गलती नहीं है क्योंकि वह जानते हैं कि उनकी सीमा तमिलनाडु से लेकर केरल तक ही है। इसके आगे उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। क्योंकि उनका फिल्मी लोकप्रियता का जमाना निकल चुका है। इसलिए वह राजनीति में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। अभिनेता कमल हासन ने एक तमिल पत्रिका में अपने साप्ताहिक लेख में हिंदू आतंकवाद का मुद्दा उठाया है। हासन ने लिखा, आप ये नहीं कह सकते कि हिंदू आतंकवाद नहीं है । पहले हिंदू कट्टरपंथी बातचीत करते थे, अब वे हिंसा करते हैं। अपने लेख में कमल हासन ने ये भी कहा है कि अब सत्यमेव जयते से लोगों का विश्वास उठ गया है। उन्होंने लिखा,सत्य की ही जीत होती थी, लेकिन अब ताक़त की ही जीत होती है ऐसा बन गया है। इससे लोग अमानवीय हो गए हैं। इससे पहले आमिर खान ने भीे ऐसी बयानबाजी की थी। इसका जवाब लोग अच्छी तरह से दे चुके हैं। कमल हासन को एहसानफरामोश नहीं होना चाहिए। जिस धरती ने उन्हें जन्म दिया और वो सब कुछ दिया,जिसके लिए लोग तरसते हैं। और उसी धरती को अपमानित करके अपना निशाना साधने की कोशिश कर रहे हैं क्या यही उनका आदर्श है। विचारधारा कोई भी हो सकती लेकिन सस्ती लोकप्रियता की सीढ़ी नहीं लिफ्ट से चढक़र राजनीति का आकाश छूना चाहते हैं। कमल हासन साहब सीढ़ी में तो पायदान होते हैं आदमी किसी न किसी पायदान से फिसलने पर निचले वाले पायदान पर ठहर तो सकता है लेकिन लिफ्ट तो लिफ्ट है एक मिनट पर आपको आसमान भी दिखा सकती है तो दूसरे मिनट में आपको कहां ले जा सकती है, इसकी आपने कल्पना भी की है या....

5 नवंबर को होगी ट्रांस्पोर्टरों की स्कीम लांच

रेट कम करने पर बनी सहमति

नोएडा। नोएडा ट्रांस्पोर्टरों का एक प्रतिनिधिमंडल आज ओएसडी राजेश प्रकाश व इंडस्ट्री जीएम नवीन कुमार से मिला। मुलाकात के दौरान ट्रांस्पोर्ट नगर स्कीम लांच करने की 15 नवंबर तारीख की बात कही गई। प्रतिनिधिमंडल में शामिल वेदपाल चौधरी ने बताया कि आज सोमवार को प्राधिकरण अधिकारियों से ट्रांस्पोर्टरों की मांगों को लेकर दो घंटे की बैठक की गई। जिसमें प्राधिकरण द्वारा बढ़ाये जा रहे प्लॉट के रेट 32,200 को कम करने की बात कही गई। इसी के साथ समयानुसार ट्रांस्पोर्ट नगर की स्कमी 15 नवंबर को लांच करने पर सहमति बनी। उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने अभी पांच दिन का समय लिया गया है जिसपर ट्रांस्पोर्टर नगर से संबंधित मांगों पर और विचार किया जायेगा।

मनोज गोयल बने सपा से दादरी नगर पालिका अध्यक्ष पद के उम्मीदवार

दादरी:- सामाजवादी पार्टी ने बुधवार को नगर पालिका दादरी अध्यक्ष पद के लिये व्यापारी नेता मनोज गोयल को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। इससे पहले सपा से सम्भावित उम्मीदवारों मे सबसे आगे चल रहे पूर्व चेयरमैन विक्रम सिंह ने अपना आवेदन वापस लेते हुए मनोज गोयल को अपना समर्थन दे दिया था। इस पर विक्रम सिंह ने कहा कि दादरी नगर में व्यापारियों के सम्मान के लिये उन्होंने अपना आवेदन वापस ले लिया है और अपना पूर्ण समर्थन व्यापारी नेता मनोज गोयल को दिया है। उन्होंने कहा कि व्यापारी नेता मनोज गोयल एक साफ सुथरी छवि वाले इंसान है और नगर में सभी वर्गो के लोकप्रिय नेता है। उनके प्रत्याशी घोषित होने से  समाजवादी पार्टी इस चुनाव में भारी जीत हासिल करेगी। समाजवादी पार्टी के जिला संगठन प्रभारी फकीर चंद  नागर ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि  मनोज गोयल  व्यापारी वर्ग के एक बड़े नेता है। उनके रुप में समाजवादी पार्टी को मजबूत उम्मीदवार मिला है।  उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओ से अपील करते हुए कहा कि सभी समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता पूरी ईमानदारी से इस चुनाव में जुट जाये और पार्टी कि जीत में अहम भूमिका निभाने का काम करे।

Wednesday, 1 November 2017

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा, तनख्वाह कब बढ़ाएगी सरकार

सेलरी में कैबिनेट सेक्रेटरी, सेना प्रमुख टॉप पर पीएम व राष्ट्रपति हैं चौथे व पांचवें नंबर पर

आप चौँक जाएंगे यह जानकर कि भारत की कमान संभालने वाले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, गवर्नर,चीफ जस्टिस आफ इंडिया की वेतन की बात करें तो ये नौकरशाह या लालफीताशाह से चौथे-पांचवें पायदान से भी नीचे आते हैं।
आज सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से ये पूछा कि उनकी सेलरी कब बढ़ेगी? लगता है कि सरकार उनके वेतन बढ़ाना भूल गई है? हालांकि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के वेतन में बढ़ोत्तरी सरकार सीधे नही करती बल्कि संसद में बिल पास कराना होता है।
आइए देखते हैं कि भारत सरकार में वेतन का ढांचा किस प्रकार का है? यहां सबसे अधिक सेलरी कैबिनेट सेक्रेटरी, सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों को मिलती हैं। इनकी सेलरी का बेसिक पे स्केल 2,50,000 रुपये है। इनके बाद नंबर आता है सेक्रेटरी आफ गवर्नमेंट आफ इंडिया,स्पेशल सेक्रेटरी, वाइस आर्मी स्टाफ, चीफ सेके्रटरी आफ गवर्नमेंट का, जिनकी सेलरी का बेसिक पे स्केल है 2,25,000। इसके बाद नंबर है सेके्रटरी आफ इंडिया और प्रिंसिपल सेक्रेटरी आफ स्टेट गवर्नमेंट का, जिनका बेसिक पे स्केल है 1,82,000। इसके अलावा तमाम भत्ते तथा अन्य सरकारी सुविधाएं अलग हैं।
देश की तीन प्रमुख श्रेणियों के बाद नंबर आता है प्रधानमंत्री का, इनकी बेसिक पे है 1,65,000, इसके बाद पांचवां नंबर आता है देश के प्रथम नागरिक यानी महामहिम राष्ट्रपति का, जिनकी सेलरी का बेसिक पे स्केल है 1,50,000। उपराष्ट्रपति का नंबर इसके बाद आता है। इनकी बेसिक पे स्केल है 1,25,000। सातवें नंबर पर आते हैं राज्यों के राज्यपाल। इनका बेसिक पे स्केल है 1,10,000।
आठवें नंबर पर आते हैं देश की सबसे ऊंची अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के मुखिया यानी चीफ जस्टिस आफ इंडिया, जो राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उसके समान ही देश की कमान संभालता है। इनकी बेसिक पे स्केल है मात्र 90,000। इनके अलावा इसी तरह संवैधानिक पद की गरिमा को संभालने वाले चीफ इलेक्शन कमिश्नर, चीफ कॉप्ट्रोलर एण्ड आडिटर जनरल, हाई कोर्ट के जज, इन सभी को बेसिक पे एक समान 90,000 ही मिलती है। इनके भत्ते व सरकारी सुविधाएं अलग-अलग होतीं हैं। अन्य जजों की सेलरी का बेसिक पे 80,000 है। जबकि देश के लिए कानून बनाने वाले सांसदों की बेसिक पे है 50,000। इन्हीं सांसदों में कुछ मंत्री भी बनते हैं। इनकी सेलरी तो वहीं रहती है लेकिन भत्ते व सरकारी कामकाज के हिसाब से अन्य सुविधाएं अतिरिक्त मिलतीं हैं। देखिये है न भारत का कितना बढिय़ा ढांचा।
सुप्रीम कोर्ट ने सेलरी को लेकर टिप्पणी की है तो कोई गलत नहीं की है। देखना है कि सरकार अब इस विषय में क्या करती है?

Tuesday, 31 October 2017

चुनाव से पहले ही मोदी आगे,राहुल पीछे!

हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनाव के मैदान में भाजपा अब वास्तव में आगे और कांग्रेस पिछड़ती नजर आ रही है। हालांकि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अकेले दम पर भाजपा को बैकफुट पर ला दिया था। अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान जिस तरह से राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर अपने प्रहार किए वह काफी धारदार थे। यही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गढ़ गुजरात में जिस तरीके से राहुल गांधी ने मतदाताओं के बीच पैठ बनाने की कोशिश की वह तारीफेकाबिल है। इसी वजह से भाजपा का हाईकमान चिंतित हो उठा। इसी चिंता से सराबोर होकर प्रधानमंत्री ने अपने तरकश से तीर निकाल कर गुजरात और हिमाचल प्रदेश दोनों को ही अपनी ओर आकर्षित किया है वह यह बता रहा है कि देश में चल रहा 2014 से मोदी तिलिस्म अभी खत्म नहीं हुआ है। आर्थिक मंदी की खबरों ने लोगों को परेशान किया और लोग मोदी के विरोध खड़े भी हो रहे थे लेकिन मोदी सरकार जिस तरह से आर्थिक मंदी के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालकर राष्ट्रप्रेम के मुद्दे आगे ले कर आई है। उसने राहुल गांधी की रणनीति को फेल कर दिया है। हालांकि सोमवार को कांग्रेस की जीएसटी व नोटबंदी पर हुई बड़ी बैठक के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह से मोदी सरकार पर वार किया था। वह यह समझ कर किया कि वह भाजपा को आर्थिक मोर्चे पर घेर कर सफलता हासिल कर लेंगे। उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी को तारपीडो और बम तक करार दिया लेकिन उनकी आवाज को अच्छी तरह से सुना ही नहीं गया बल्कि मोदी और शाह की आवाज बुलंद हो गई। अभी तक का चुनावी गणित यही कहता है कि यही दशा रही तो गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर आ रहे विभिन्न एजेंसियों के सर्वे सही साबित होंगे। यदि इसमें किसी तरह का मोड़ कांगे्रस ला पाता है तो अवश्य ही परिवर्तन हो सकता है। हालांकि ये चुनाव कांग्रेस बनाम भाजपा ही हो रहे हेँ। अन्य दलों की कोई भूमिका नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र से शिवसेना अवश्य खडी दिखाई देती है, लेकिन दोनों की विचारधारा में जमीन आसमान का अंतर है और इस साथ का इन चुनावों पर कोई प्रत्यक्ष असर पड़ता नहीं दिखाई दे रहा है। राहुल की स्थिति को समझकर ही गुजरात के पाटीदार व अन्य समाज के नेता अनावश्यक दबाव बना रहे हैं। वे ऐसी मांगे सामने रख रहे हैं जिनको पूरा कर पाना असंभव है। कांग्रेस हाईकमान को पहले ही सोच समझ कर काम करना चाहिए था। कांग्रेस ने ऐसा भानुमती का कुनबा जोडऩे की कोशिश की, जिसका नाकाम होना तय ही माना जा रहा था। गुजरात चुनाव को लेकर एक हफ्ते पहले तक कांग्रेस के राहुल गांधी ड्राइविंग सीट पर थे वहीं अब मोदी ने उस सीट पर कब्जा कर लिया है। जनता का रुख क्या आता है, यह तो वक्त ही बता सकता है। क्योंकि अभी तो चुनाव होने में काफी वक्त है। तब तक को बहुत कुछ हो सकता है। 

दमदार बैट्री है नोकिया-2 की

नोकिया कंपनी के मोबाइल फोन खरीदने वालों को काफी दिनों से इस सस्ते हैंडसेट नोकिया-2 का इंतजार था। आज बुधवार को इसकी लांचिंग हो गई। इस हैंडसेट की सबसे बड़ी खूबी इसकी दमदार 4100 एमएएच की बैट्री बताई जा रही है। इस हैंडसेट के दाम 7000 से 7500 के बीच बताए जा रहे हैं। इस हैंडसेट का मुकाबला मोटो सी और शाओमी रेडमी 4 से बताया जा रहा है।
युवाओं को आजकल अपने हैंडसेट में स्पेस अधिक चाहिए। नोकिया ने स्पेस एक जीबी और आठ जीबी कर रखा है जबकि इस स्पेस वाले मोटो सी के हैंडसेट के रेट 5200 रुपये हैं। ऐसी स्थिति में लोग नोकिया खरीदेंगे या मोटो सी, इस बात का अनुमान स्वयं कंपनी लगाए। केवल बैट्री की कीमत पर अब लोग हैंडसेट नहीं खरीदना चाहते। अब तो लोग हैंडसेट में सभी सुविधाओं के साथ अधिक से अधिक सुविधाओं वाला हैंडसेट खरीदना चाहते हैं।
नोकिया 2 एंड्रायड 7.1.1 नॉगट आपरेटिंग सिस्टम पर रन करता है और इसमें जल्द ही एंड्रॉयड 8.0 ओरिया का अपडेट किया जाएगा। फोन में 5 इंच का एचडी रेजोल्यूशन वाली 16:9 ऐस्पेक्ट रेशियो वाली एलटीपीएस स्क्रीन दी गई है। कंपनी ने दावा किया है कि इस स्मार्ट फोन में दी गई 4100 एमएएच की बैट्री दो दिनों तक चलेगी। इस हैंडसेट में 1 जीबी की रेम और 8 जीबी की इनबिल्ट स्टोरेज दी गई हेै। नोकिया-2 में 5 मेगापिक्सल का फिक्सड फोकस फ्रंट कैमरा और 8 मेगापिक्सल का आटोफोकस रियर कैमरा एलईडी फ्लैश के साथ मिलेगा। इस फोन की सबसे कमी यही बताई जा रही है कि हैंडसेट की रैम एक जीबी है जबकि अन्य हैंडसेट में 2 जीबी और 16 जीबी की दी हुई है।
सस्ता है मोटो सी
मात्र 5,199 रुपये वाले मोटो सी में 5 इंच की डिस्पले स्क्रीन है। एंड्रायड 7.0 नॉगट पर सिस्टम रन करता है। कैमरा दो एमपी और 5 एमपी का रियर कैमरा है। इस हैंडसेट में एक जीबी रैम और 17 जीबी रोम है। इसकी बैटरी कमजोर है। बैट्री केवल 2350 एमएएच की है। हालांकि 6,999 के मोटोसी हैंडसेट में 2 जीबी की रैम दी हुई है।
रेडमी-4 भी नहीं है कमजोर
नवंबर 2016 में लांच हुए शाओमी का रेडमी-4 हैडसेट भी 6,999 रुपये का है। इस सेट में 5 इंच की स्कूली है। इसमें 3 जीबी की रैम है। फोन पैक में 32 जीबी तक की इंटरनल स्टोरेज है। इसे माइक्रो एसटी कार्ड से 128 जीबी तक एक्सपेंड किया जा सकता है। इस हैंडसेट में 5 मेगा पिक्सल का सेल्फी कैमरा और 13 मेगा पिक्सल का रियर कैमरा है। इ हैंडसेट में 4100 एमएएच की बैट्री है। लेकिन यह बैट्री हैंडसेट में ही इन्सटाल्ड है। इसके अलावा इस फोन की खूबियों की लम्बी फेहरिस्त है। या यूं कहें कि आजकल के युवाओं को जो कुछ भी हैंडसेट में चाहिए वह सब कुछ है।