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Sunday, 9 October 2016

अहंकार का नाशक भी है दशहरा


दशहरा का त्यौहार भारत में बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार हैं । इस त्यौहार को विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता हैं।माँ दुर्गा की नौ दिनों तक पूजा करने के पश्चात दशमी के दिन यह त्यौहार मनाया जाता हैं। इस वर्ष यह पर्व आगामी 11 अक्टूबर को मनाया जा रहा है।  यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता हैं। इस दिन रावण का पुतला पुर देश भर में जलाया जाता हैं।
इस दिन भगवान राम ने राक्षस रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था और सारा समाज भयमुक्त हुआ था। रावण को मारने से पूर्व राम ने दुर्गा की आराधना की थी। मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था। रावण दहन आज भी बहुत धूमधाम से किया जाता है। इसके साथ ही आतिशबाजियां छोड़ी जाती हैं। दुर्गा की मूर्ति की स्थापना कर पूजा करने वाले भक्त मूर्ति.विसर्जन का कार्यक्रम भी गाजे.बाजे के साथ करते हैं।
भक्तगण दशहरे में मां दुर्गा की पूजा करते हैं। कुछ लोग व्रत एवं उपवास करते हैं। पूजा की समाप्ति पर पुरोहितों को दान.दक्षिणा देकर संतुष्ट किया जाता है। कई स्थानों पर मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन भी किया जाता है।दस दिन पहले ही रामलीला का मंचन आरंभ हो जाता है। इन दिनों रामकथा को नाटक रूप में दिखाया जाता है। दसवें दिन रावण, मेघनाद और कुभकरण के पुतले का दहन किया जाता है। इस अवसर पर विभिन्न स्थानों पर बड़े.बड़े मेलों का आयोजन भी किया जाता है। विद्यालयों में बच्चों के लिए दस दिन का अवकाश भी घोषित कर दिया जाता है।
बच्चे बड़े उत्साह के साथ रावण दहन देखने जाते हैं और मेलों में बहुत आनंद उठाते हैं। भारत के सभी स्थानों में इसे अलग.अलग रूप में मनाया जाता है। कहीं यह दुर्गा विजय का प्रतीक स्वरूप मनाया जाता हैए तो कहीं नवरात्रों के रूप में। बंगाल में दुर्गा पूजा का विशेष आयोजन किया जाता है। यह त्योहार हर्ष और उल्लास का प्रतीक है। इस दिन मनुष्य को अपने अंदर व्याप्त पाप, लोभ, मद, क्रोध, आलस्य, चोरी, अंहकार, काम, हिंसा, मोह आदि भावनाओं को समाप्त करने की प्रेरणा मिलती है। यह दिन हमें प्रेरणा देता है कि हमें अंहकार नहीं करना चाहिए क्योंकि अंहकार के मद में डूबा हुआ एक दिन अवश्य मुँह की खाता है।



रावण बहुत बड़ा विद्वान और वीर व्यक्ति था परन्तु उसका अंहकार ही उसके विनाश कारण बना। यह त्योहार जीवन को हर्ष और उल्लास से भर देता हैए साथ यह जीवन में कभी अंहकार न करने की प्रेरणा भी देता है।

शक्ति पूजा का पर्व है दशहरा


दशहरा ,विजयदशमी या आयुध.पूजा, हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन  मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण.यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों. काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। दशहरा को दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार वर्षा ऋतु के अंत में संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है। नवरात्र में मूर्ति पूजा में पश्चिम बंगाल का कोई सानी नहीं है जबकि गुजरात में खेला जाने वाला डांडिया बेजोड़ है। पूरे दस दिनों तक त्योहार की धूम रहती है। लोग भक्ति में रमे रहते हैं। मां दुर्गा की विशेष आराधनाएं देखने को मिलती हैं।  दशमी के दिन त्योहार की समाप्ति होती है।
इस दिन भगवान राम ने राक्षस रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था। और सारा समाज भयमुक्त हुआ था। रावण को मारने से पूर्व राम ने दुर्गा की आराधना की थी। मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था। भक्तगण दशहरे में मां दुर्गा की पूजा करते हैं। कुछ लोग व्रत एवं उपवास करते हैं। पूजा की समाप्ति पर पुरोहितों को दान.दक्षिणा देकर संतुष्ट किया जाता है। कई स्थानों पर मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन भी किया जाता है। देश के कोने.कोने में यह विभिन्न रूपों से मनाया जाता है, बल्कि यह उतने ही जोश और उल्लास से दूसरे देशों में भी मनाया जाता जहां प्रवासी भारतीय रहते हैं। मैसूर का दशहरा देशभर में विख्यात है। मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को रोशनी से सज्जित किया जाता है और हाथियों का श्रृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य जुलूस निकाला जाता है।
इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीपमालिकाओं से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इसके साथ शहर में लोग टार्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभा यात्रा का आनंद लेते हैं। द्रविड़ प्रदेशों में रावण-दहन का आयोजन नहीं किया जाता है।
सुनील कुमार 

Saturday, 8 October 2016

धन-सम्पदा का वरदान देतीं हैं माता महागौरी

नवरात्रि काल में रात्रि का विशेष महत्व होता है। देवियों के शक्ति स्वरुप की उपासना का पर्व नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक, निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है।
सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की। तब से असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति माता दुर्गा के उन नौ रूपों का भी पूजन किया जाता है जिन्होंने सृष्टि के आरंभ से लेकर अभी तक इस पृथ्वी लोक पर विभिन्न लीलाएं की थीं। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह़मचारिणी, 
तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थम।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च,
सप्तमं कालरात्रीति, महागौरी चाष्टमम्। 
नवमम् सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता। 
अष्टम नवदुर्गा:
माता महागौरी:   शंख और चन्द्र के समान अत्यंत श्वेत वर्ण धारी माँ महागौरी माँ दुर्गा का आठवां स्वरुप हैं। इन माता की पूजा ०९ अक्टूबर को की जाएगी। मां का स्वरूप धार्मिक ग्रन्थ के अनुसार भगवान शिव को पाने के लिए किये गए अपने कठोर तप के कारण माँ पार्वती का रंग काला और शरीर क्षीण हो गया था, तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव ने माँ पार्वती का शरीर गंगाजल से धोया तो वह विद्युत प्रभा के समान गौर हो गया। इसी कारण माँ को महागौरी के नाम से पूजते हैं। महागौरी की चार भुजाएं हैं जिनमें से दो अभयमुद्रा और वरमुद्रा में हैं तथा दो में त्रिशूल और डमरू धारण किया हुआ है। अपने सभी रूपों में से महागौरी, माँ दुर्गा का सबसे शांत रूप है। अष्टमी के दिन कन्या पूजन का भी विधान है।महागौरी की उपासना का मंत्र है.
श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दघान्महादेवप्रमोददा॥
नवम नवदुर्गा:
माता सिद्धिदात्री :सिद्धियों की दाता माँ सिद्धिदात्री देवी दुर्गा का अंतिम स्वरुप हैं। इन माता की पूजा १० अक्टूबर को की जाएगी नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा और कन्या पूजन के साथ ही नवरात्रि का अंत होता है। माँ सिद्धिदात्री भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। मान्यता अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की उपासना कर सिद्धियों को प्राप्त किया था। माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैंए जिनमें गदा, कमल पुष्प, शंख और चक्र लिये माँ कमल के फूल पर आसीन हैं। माँ सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। इनका उपासना मंत्र है.
सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

Thursday, 2 June 2016

सृष्टि के विकासकर्ता ऋषि कश्यप



 जब हम सृष्टि के विकास की बात करते हैं तो इसका मतलब है जीव, जंतु या मानव की उत्पत्ति से होता है। सृष्टि के विकास की चर्चा ऋषि कश्यप से शुरू होती है। हालांकि  सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में लीन रहते थे। समस्त देव, दानव एवं मानव ऋषि कश्यप की आज्ञा का पालन करते थे। इन मूल पुरुष कश्यप ने अपने आज्ञा पालन करने वालों को अपना नाम दे दिया। इस प्रकार से कश्यप परिवार का सबसे अधिक विस्तार हुआ। सप्तर्षि गणों में से एक वैदिक ऋषि कश्यप एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने हमें आदित्य देवता, दैत्य-दानव,खुर वाले अश्व आदि पशु, गन्धर्व, राक्षस, वृक्ष, अप्सरा, सर्प,गौ-महिष व श्वापद हिंसक पशुओं से परिचय कराया। कश्यप ऋषि ने ही सर्वप्रथम इन सभी मानव,जीव-जंतु आदि के प्रथम पुरुषों को अपना नाम 'कश्यपÓ दिया। इसलिए कश्यप ऋषि को ब्रह्माजी के बाद सृष्टि का विकासकर्ता माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ऋषि कश्यप और राजा दक्ष ने मिलकर सृष्टि के तमाम जीव-जंतुओं की खोज कर हमारा मार्गदर्शन किया। पुराणों के अनुसार एक कश्यप ऋषि ने बहुत सी स्त्रियों से विवाह कर अपने कुल का विस्तार किया था, जिसमें आदित्य देवता, दैत्य-दानव,खुर वाले अश्व आदि पशु, गन्धर्व, राक्षस, वृक्ष, अप्सरा, सर्प,गौ-महिष व श्वापद हिंसक पशु शामिल थे । यह सत्य नहीं माना जा सकता। यहां पर थोड़ा भ्रम है। दक्ष प्रजापति की विभिन्न वर्ग की 17 कन्याओं से विवाह करने वाले पुरुष कश्यप भी सत्रह ही थे। ये सभी अपने-अपने वर्ग के प्रथम पुरुष वर्ग के मानव,जीव-जन्तु, वृक्ष,लताएं आदि थे।

 शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति को कश्यप कहा गया है

स यत्कुर्मो नाम। प्रजापति: प्रजा असृजत।
यदसृजत् अकरोत् तद् यदकरोत् तस्मात् कूर्म:
कश्यपो वै कूम्र्स्तस्मादाहु: सर्वा: प्रजा: कश्यप:।

 ब्रह्मा के छह मानस पुत्रों में से एक मरीचि थे जिन्होंने अपनी इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति पुत्र उत्पन्न
किया।  ऐतरेय ब्राह्मणों ने कश्यपों का सम्बन्ध विभिन्न वर्गों के जीव-जन्तुओं, मानव-दानव, देव-दैत्य,  अप्सरा,गौ-महिष,हिंसक पशु आदि वर्ग के प्रथम नर से बताया है। इन सभी कश्यपों की अपनी-अपनी

बारह भार्याएँ थीं। उनके नाम हैं: अदिति, दनु, विनता, अरष्ठा, कद्रु, सुरशा, खशा, सुरभी, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा और मुनि इन से सब सृष्टि हुई।
ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीचि के विद्वान पुत्र थे। मान्यता अनुसार इन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता कला कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी।
कश्यप को ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माना गया हैं। हम सभी उन्हीं की संतानें हैं। माना जाता है कि सृष्टि की रचना और विकास के काल में धरती पर सर्वप्रथम भगवान ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी से दक्ष प्रजापति का जन्म हुआ। ब्रह्माजी के निवेदन पर दक्ष प्रजापति ने अपनी पत्नी असिक्नी के गर्भ से 66 कन्याएँ पैदा की। मुख्यत: इन्हीं कन्याओं से सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए। ऋषि कश्यप सप्तऋषियों में प्रमुख माने जाते हैं। सातवें मन्वन्तर में सप्तर्षि इस प्रकार रहे हैं. वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।
आदित्य वर्ग के कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से बारह आदित्यों को जन्म दिया, जिनमें भगवान नारायण का वामन अवतार भी शामिल था। माना जाता है कि चाक्षुष मन्वन्तर काल में तुषित नामक बारह श्रेष्ठगणों ने बारह आदित्यों के रूप में जन्म लिया, जो कि इस प्रकार थे, विवस्वान, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम,भगवान वामन।
सूर्यवंशी ऋषि कश्यप के पुत्र विस्वान से मनु का जन्म हुआ। महाराज मनु को इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त,प्रान्शु, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक दस श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति हुई।
राक्षस वर्ग के ऋषि कश्यप ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। इन तीन संतानों के अलावा दिति के गर्भ से 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र निसंतान रहे। जबकि हिरण्यकश्यप के चार पुत्र थे, अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। दैत्य वर्ग के ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई। अन्य वर्ग के कश्यपों की रानियों में से रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए। सुरसा नामक रानी से यातुधान राक्षस उत्पन्न हुए। इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। मुनि के गर्भ से अप्सराएँ जन्मीं। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने साँप,बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए। ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया। सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की। रानी सरसा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जन्तुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया। रानी विनता के गर्भ से गरुड़ और वरुण  पैदा हुए। कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई, जिनमें प्रमुख आठ नाग थे.अनंत ;शेष, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक। रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ। यामिनी के गर्भ से शलभों यानी पतंगों का जन्म हुआ। 

Wednesday, 18 May 2016

जीव क्या है और कैसा है?

जीव के विषय में संशय रहित ज्ञान की अत्यन्त आवश्यकता है। जीव के विषय में ऐसा जानना चाहिए कि जीव भी एक वस्तु या द्रव्य है। जैसे भूमि,जलाधि द्रव्य है,वैसे ही जीव भी एक द्रव्य है । जीव के लक्षण इस प्रकार से हैं-जीव सत् है,इसका कभी नाश नहीं होता,यह एक सत्तात्मक पदार्थ है। चित् है-चेतन है,अर्थात ज्ञानवान वस्तु है। अनादि है-इसकी कभी उत्पत्ति नहीं होती। इच्छा से युक्त है जिस वस्तु को हितकारी समझता है उसको लेने की इच्छा करता है। एक देशी है-एक स्थान पर रहता है,ईश्वर की भांति सर्वव्यापक भी नहीं है। अल्पज्ञ है-थोड़ा जानता है, सर्वज्ञ नहीं। कर्म करने में स्वतन्त्र है,अर्थात अच्छे-बुरे कर्म करने में स्वतन्त्र है और उन कर्मो के फल भोगने में ईश्वर के अधीन है। जब जीवात्मा अपने स्वरूप को अच्छे प्रकार से जान लेते हैं तो वह मन और इन्द्रियों को अपने अधिकार में कर लेता है। जिस प्रकार से एक विमान चालक अपने स्वरूप को ठीक प्रकार से जानता और विमान के स्वरूप संचालन को भी ठीक प्रकार से जानता है तो विमान को अपने नियन्त्रण में रखकर अपने लक्ष्य पर पहुंच जाता है। इससे भिन्न स्थिति में विमान चालक अपने अभीष्ट लक्ष्य पर नहीं पहुंच सकता। यही बात योग के विषय में भी जाननी चाहिए कि जो व्यक्ति अपने शरीर,इन्द्रियों,मनादि साधनों को ठीक प्रकार से जानता है और अपने स्वरूप को भी ठीक प्रकार से जानता है वही अपने लक्ष्य ब्रह्मप्राप्ति को कर पाता है अन्य नहीं। इसी बात को समझाने के लिए उपनिषद् में कहा है कि -हे मनुष्य! तू आत्मा को रथी जान,शरीर को रथ जान, बुद्धि को सारथी जान, मन को लगाम जान, फिर इनका प्रयोग कर।जो साधक आत्मा के स्वरूप को और शरीरादि साधनों को अच्छे प्रकार से नहीं जानते वे यही कहते हैं कि मेरा मन नहीे मानता,मेरे अधिकार में नहीं रहता, मेरी इच्छा के बिना स्वयं विषयों की ओर चला जाता है। इस अवस्था में योगाभ्यासी योगमार्ग में सफल नहीं हो पाता।जब व्यक्ति आत्मा के स्वरूप को ठीक प्रकार से जान लेते है तो चित्त की वृत्तियों के निरोध करने मे निश्चितरूपेण सफलता प्राप्त कर लेता है।

Monday, 16 May 2016

स्वभाव से पवित्र है आत्मा

जीव-शरीरस्थ व्यापक आत्मा स्वभाव से पवित्र है। आत्मा की शक्ति से ही जीवों का दृष्टिमान स्थूल शरीर क्रियाशील है। यह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर, अविनाशी तथा शरीर की समस्त इन्द्रियों का स्वामी है। इन्द्रियां तभी तक कार्य करतीं हैं जब तक आत्मा शरीर में है। शरीर और शरीर के साथ समस्त इंन्द्रियां नाशवान हैं परन्तु आत्मा अनिपद्यमान अर्थात नष्ट न होने वाली अविनाशी है। आत्मा नित्य अर्थात सदैव रहती है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा भी है-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: । न चैनं क्लेदन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।
इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, इसको आग जला नहीं सकी। इसको जल डुबा नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती। इस अविनाशी आत्मा स्वामी परमात्मा है। वेद में भी कहा गया है-
अग्ने घृतव्रताय ते समुद्रायेव सिन्धव:। गिरो वाश्रास ईरते।। ऋग्वेद मंडल 8 सूक्त 44 मंत्र 25
यह शरीरस्थ आत्मा ईश्वर का सखा और सेवक है यह अपने स्वामी का महान ऐश्वर्य चिरकाल से देख रहा है। यद्यपि शरीरबद्ध होने के कुछ काल के लिए स्वामी से विमुख हो रहा है। इसकी स्वाभाविक गति ईश्वर की ओर ही है, जैसे नदियों की गति समुद्र की ओर होती है।
शास्त्रों में ऋषियों ने भी कहा है कि हे मनुष्यों ! तुम शरीर मात्र नहीं हो, तुम आत्मा हो। शरीर रूपी रथ का आत्मा रथी है। बुद्धि और ज्ञान कोचवान, मन लगाम, शरीर की दस इंन्द्रियां जिनमें पांच ज्ञानेंन्द्रियां -कान,त्वचा,आंख, जीभ, और नाक। तथा पांच कर्मेन्द्रियां-वाणी,हाथ,पैर,गुदा और उपस्थ रथ के घोड़े और इन्द्रियों के भोग, इनका भोजन है।
आत्मा की मुक्ति का स्वरूप क्या है?
शरीर आत्मा का भोग स्थूल है अर्थात जन्म जन्मान्तर में कृत पुण्य और पापों के कर्मफल को भोगने का माध्यम है। जब बुद्धि ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो जाती है और मनुष्य इसके प्रकाश में शुभ कर्म कर इस आत्मा को शुद्ध और निर्मल कर,पुण्यों से संस्कारित कर लेता है तो आत्मा इस शरीर के माध्यम से सुख-शान्ति तथा आनन्द प्राप्त कर अन्त में संचित शुभ कर्मों के प्रभाव से अपने स्वामी यानी परमात्मा के सान्निध्य में विचरती है। यही आत्मा की मुक्ति का स्वरूप है।
परन्तु इसके विपरीत जब मनुष्य अज्ञान के अन्धकार में डूब जाता है तो शरीर रूपी रथ का बुद्धि रूपी कोचवान,ज्ञान से रहित अज्ञान ग्रसित होकर संसार के अस्थाई आनन्द को सदैव रहने वाला समझ शरीर को ही सब कुछ मान कर आमोद-प्रमोद को ही जीवन का परम लक्ष्य जान और मान विलास में लिप्त होकर,मदहोश,शराबी की भांति शरीर और मन पर से नियंत्रण खो बैठता है। जैसे कोचवान के मदहोश होने पर लगाम से उसका नियंत्रण समाप्त होकर घोड़ों की लगाम ढीली हो जाती है। लगाम के ढीले होते रथ में जुते घोड़े स्वच्छन्द हो निर्धारित मार्ग को छोड़ कर मार्ग से भटक  कर जहां-तहां ,इधर-उधर सरपट दौड़ लगाते हैं और मार्ग आने वाले खार खण्डों, रोड़े पत्थरों आदि से न बचकर उनसे ठोकर खा-खाकर खार खण्डों में गिर कर रथी और स्वयं के हाथ-पैर तुड़वा कर विनाश को प्राप्त होते हैं। उसी प्रकार ज्ञान से रहित मनुष्य की बुद्धि अज्ञान से ग्रसित होकर, मन पर से नियंत्रण खो बैठती है। मनुष्य मन पर से नियंत्रण खो, इन्द्रियों के वशीभूत हो,इन्द्रियों को उनके निर्धारित विषयों को भोग-भोगने के लिए स्वतन्त्र छोड़ देता है। वह भोग भोगने के पदार्थों  और साधनों के उपलब्धता के लिए नैतिकता-अनैतिकता,धर्म-अधर्म,उचित-अनुचित, और बुरे या भले का विचार छोड़ दुष्कर्मों के द्वारा अपनी आत्मा को पापों से संस्कारित, अपवित्र तथा मलिन कर बैठता है। परिणामस्वरूप वर्तमान शरीर की मृत्यु के उपरान्त आत्मा जन्म-जन्मान्तरों में नाना प्रकार की योनियों को प्राप्त होकर घोर पीड़ा,रोग,शोक तथा दुख भोगती है।

Friday, 13 May 2016

कटु सत्य

जो भाग्य में है, वो भाग कर आएगा
जो नहीं है, वह आकर भी भाग जाएगा।

जिंदगी को इतना सीरियस लेने की जरूरत
नहीं है यारों
यहों से जिन्दा बचकर कोई नहीं जाएगा।
एक सत्य यह है कि अगर जिंदगी
अच्छी होती तो
हम इस दुनिया में रोते-रोते हुए न आते
मगर मीठा सत्य यह भी है कि
अगर जिंदगी बुरी होती तो
लोगों को रुलाकर न जाते...
वाह रे मानव तेरा स्वभाव..

लाश को हाथ लगाता है तो नहाता है..
पर बेजुबान जीव को मार के खा जाता है।
यह मंदिर-मस्जिद भी क्या गजब की जगह है
दोस्तों
जहां गरीब अंदर और अंदर भीख मांगता है

विचित्र दुनिया का कठोर सत्य है यह
बारात में दूल्हा सबसे पीछे और
दुनिया आगे चलती है
मय्यत में जनाजा आगे
और दुनिया पीछे चलती है
यानि दुनिया खुशी में आगे और
दुख में पीछे हो जाती है

अजब तेरी दुनिया-गजब तेरा खेल
मोमबत्ती जलाकर मुर्दों को याद करते हैं
और मोमबत्ती बुझा कर जनम दिन मनाते हैं

मै कौन हूं

सर्वप्रथम इस पश्न पर विचार किया जाए कि मैं कौन हूं? यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से पूछे कि तू कौन है? तो वह उसे उत्तर में अपना नाम बताएगा। मान लीजिए कि वह उत्तर में यह कहता है कि मैं श्वेतांक हूं। इसके बाद यदि प्रश्नकर्ता यह पूछे कि श्वेतांक तुम्हारे शरीर के किस अंग का नाम है? तो वह निरुत्तर हो जाएगा, क्योंकि शरीर कि किसी अंग का नाम श्वेतांक नहीं है। शरीर के अंगों के नाम तो शिर,नेत्र,ग्रीवा,नाक,कान,हाथ,पैर और उदर आदि हैं।
हम मनुष्यों ने अपनी-अपनी भाषा में प्रत्येक वस्तु का नाम रखा हुआ है। जिस प्रकार एक वृक्ष केविभिन्न अंगों के नाम -जड़,तना,डाल,पत्ते,पुष्प,फल आदि होते हें,उसी प्रकार शरीर के अंगों के नाम भी अलग-अलग हैं। जिस प्रकार जड़,तना,डाल,पत्ता ,फूल आदि के संयुक्त रूप को वृक्ष कहते हैं। और उस वृक्ष को भी उसकी विशेषताओं के आधार पर आम,नीम,वट,पीपल,अमरूद आदि का वृक्ष कहते हेँ। इसी प्रकार विभिन्न्न अंगों वालते मानव शरीर को विभिन्न नामों से पुकारते हैं।
मैं शब्द का अर्थ -आत्मा । यदि कोई व्यक्ति कहे कि मैं बहुत दुर्बल हो गया हंू तो यहां मैं का अर्थ है-मेरा या मुझ आत्मा का शरीर, परन्तु यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के समय यह कहे कि अच्छा मैं जा रहा हूं तो यहां मैं का अर्थ आत्मा है।
प्रत्येक प्राणी के शरीर में एक अदृश्य शक्ति छिपी रहती है। जिसे आत्मा कहते हें। यह आत्मा ही इस शरीर को चला रहा है। इससे सम्पूर्ण कार्य करा रहा है। यह शरीर स्वयं कुछ भी करने में असमर्थ है। शरीर में जब तक आत्मा का निवास रहता है तभी तक यह शरीर देखता है, सुनता है, हंसता-बोलता है, चलता-फिरता है,भोग-बिलास करता है, अध्ययन-लेखन करता है, योग साधना करता है, सुख-दुख का अनुभव करता है और स्वस्थ-सुन्दर रहता है परन्तु जैेसे ही आत्मा इस शरीर से निकल जाता है वैसे ही यह शरीर एक ओर लुढ़क जाता है। इसका देखना,हंसना-बोलना,चलना-फिरना आदि सभी कार्य बन्द हो जाते हैं और यह अत्यधिक सुन्दर शरीर गलने-सडऩे लगता है।
यदि शरीर अकेला होता या इसमें आत्मा की कोई सत्ता न होती तो यह शरीर इस प्रकार निष्क्रिय क्यों हो जाया करता। मृत्यु क बाद शरीर तो पहले जैसा रहता है, परंतु संसार के सभी चिकित्सक एवं वैज्ञानिक मिलकर भी उसे जीवित नहीं कर सकते, न आज तक कर सके हैं और न भविष्य में कभी कर सकेंगे। यह शाश्वत सत्य है और जीवन-नियम मानव के हाथ या अधिकार से बाहर है। इस प्रकार इस शरीर के अन्दर कोई एेसी शक्ति विद्यमान रहती है, जो परमात्मा की आज्ञा से इस शरीर को धारण करती है तथा उसकी आज्ञा से इस शरीर को छोड़ देती है। यह शक्ति ही आत्मा है। यह आत्मा ही मैं हूं। अत: मैं कौन हूं? इस प्रश्न का उत्तर है-मैं आत्मा हूं, जो शरीर में रहता हूं। हमें यह जान लेना भी आवश्यक है कि आत्मा कैसा है, कहां  रहता है और क्या करता है।
जब यह ज्ञात हो गया कि मैं आत्मा हूं तो यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि मैं कैसा हूं? अर्थात आत्मा का स्वरूप कैसा है? वेद तथा वेदानुकूल धर्म-ग्रन्थों में आत्मा के स्वरूप का वर्णन विस्तारपूर्वक विद्यमान है। 

Thursday, 12 May 2016

मानव जीवन का रहस्य


परमपिता परमात्मा की कृपा से जब मनुष्य में सद्बुद्धि जाग्रत होती है, तो वह इस अद्भुत मानव-शरीर एवं जीवन को देखकर यह विचारता है कि मैं कौन हूं्र, मैं कहां से आया हूं, मैं इस पृथ्वी पर क्यों आया हूं, और इस जीवन के बाद मैं कहा चला जाऊंगा। यह विचार प्रत्येक मनुष्य के मन में उत्पन्न नहीं होता क्योंकि जो व्यक्ति मात्र खाने-पीने ,सोने-जागने,धन-संग्रह करने, भोग-विलास करने, शरीर को सजाने-संवारने या अन्य सांसारिक कार्यो में ही लगे रहते हें, जो सदैव इन कार्यों को करने की ही चिन्ता करते रहते हैंं। इस संसार को अद्भुत रचना-प्रक्रिया को देखकर चकित नहीं होते और इसके रचयिता का चिन्तन नहीं करते,उनके मन  में ये प्रश्न उत्पन्न नहीं होते । जिस व्यक्ति के मन में ये प्रश्न उत्पन्न होते हें और जो उनका उत्तर पाना चाहता है, वह व्यक्ति निश्चय ही सौभाग्यशाली है। इसके विपरीत जिसके मन में ये प्रश्न उत्पन्न नहीं होते या उत्पन्न होने पर भी जो इनका उत्तर पाना नहीं चाहता, वह व्यक्ति अभागा है और उसका यह जीवन व्यर्थ है।
क्या है आत्मा का गूढ़ रहस्य
हम जब अध्यात्म की बात करते हैं तो हमारे सामने दो चीजें सामने आतीं हैं। एक ईश्वर,परमात्मा और दूसरी आत्मा या जीवात्मा। यदि हम प्रैक्टिकल बात करें तो हम देखते हैं कि आजकल के अर्थ युग में आधुनिक जीवनशैली में भागमभाग में इतना समय ही नहीं मिल पाता है कि मनुष्य अध्यात्म या आत्मा व परमात्मा के बारे में चर्चा कर सके। आज का मनुष्य आत्मा-परमात्मा के बारे में बात तभी करता है जब या तो वह किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा में जाता है या अंत्येष्टि स्थल पर लिखे गीता व अन्य ग्रंथों के वाक्यों पर चर्चा करने के बाद फिर भूल जाता है। इस कटु सत्य हमें स्वीकार करना होगा। सत्य है कि हम मोक्ष या मुक्ति के बारे में आसानी से बात करने लगते हैं लेकिन इसे पहले हमें आत्मा और परमात्मा के गूढ़ रहस्य के बारे में बात करनी होगी। आत्मा के दो प्रकार हैं-एक अणु आत्मा और दूसरा विभु आत्मा। कठोपनिषद् में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है-

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतु: पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमात्मन:।।

परमात्मा तथा अणु आत्मा दोनो शरीर रूपी वृक्ष में जीव के हृदय में विद्यमान हैं और इनमें जो समस्त इच्छाओं तथा शोकों से मुक्त हो चुका है, वही ईश्वर की कृपा से आत्मा की महिमा को जान सकता है।

आत्मा के बारे में रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं:-
ईश्वर अंश जीव अविनाशी,चेतन अमल सहज सुख राशि।।

श्रीमदभगवदगीता के दूसरे अध्याय के 20 श्लोक में लिखा है

न जायते म्रियते वा कदाचिन्, नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु। वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म लेगा। वह अजन्मा, नित्य,शाश्वत तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर मारा नहीं जाता।

जो जीवात्मा ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, वह अपनी शक्ति, गुण,स्वरूप को जाने बिना ईश्वर को नहीं जान सकता। जब व्यक्ति शीशे में देखता है तो विचारता है कि मैं पुरुष वा स्त्री हूं। काला,गोरा,नाटा,बालक,वृद्ध हूं । यह मिथ्या ज्ञान है। परन्तु मैं स्त्री,पुरुष आदि शरीर वाला हूं यह विचार करना चाहिए। आज व्यक्ति ने पृथ्वी का चप्पा-चप्पा खोज मारा,चन्द्रमादि ग्रहों तक पहुंच गया है। प्राकृतिक यानी भौतिक अनेक पदार्थों  को जान लिया है परन्तु स्वयं के बारे में मानव को बहुत अल्पज्ञान है।
परिभाषाएं व सिद्धान्त बदल जाने से विचार और व्यवहार बदल जाते हैं। कुरान-बाइबिल में आत्मा के बारे में बहुत कम बातें लिखीं हैं। जो लिखी हैं वे भी प्राय: गलत हैं। जैसे मनुष्य को छोड़कर किसी में आत्मा नहीं मानी। स्त्री में पूरी आत्मा मानते ही नहीं हैं। पाकिस्तान में स्त्री को आधी आत्मायुक्त मानने से उसे चुनाव में आधे वोट का अधिकार है। अग्नि आदि भौतिक पदार्थ के बारे में हमारा जैसा व्यावहारिक ज्ञान है, वैसा आत्मा के बारे में भी हो। मुझ आत्मा को अस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती इतना समझ लेने मात्र से कितनी शक्ति व निर्भयता आ जाती है। दयानन्द पर विष प्रयोग हुआ,मतीदास को चीरा गया। वैरागी की खाल नुचवाई गई,गुरु के बच्चे को दीवार में चिनवाए गए, कढ़ाई में तले गए, परन्तु उन्होंने आत्मा का सच्चा नित्य स्वरूप जानकर काहा कि हमारे आत्मा का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। उन्होंने अपने  अनित्य शरीर को आत्मा नहीं माना। आत्मा को जानकर व्यक्ति महान् सामथ्र्यवान् हो जाता है। यह वास्तविक ज्ञान के कारण है। जीवात्मा का कोई रंग-रूप नहीं,कोई भार नहीं है। जैसे भौतिक वस्तुओं में रंग,रूप,स्पर्श,लम्बाई,चौड़ाई आदि गुण पाये जाते हैं,वैसे जीवात्मा में नहीं हैं।
एक रोचक बात,एक पुस्तक है  501 आश्चर्यजनक तथ्य उसमें जीवात्मा का भार लिखा है कि जीवात्म 21 ग्राम का है। कुछ वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया। मरते हुए एक व्यक्ति को बॉक्स में बन्द करके तुला में तोला गया । थोड़े काल में वह मर गया, अर्थात आत्मा निकल गई उसे फिर तोला गया तो 21 ग्राम भार कम हुआ। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि जीवात्मा 21 ग्राम का है। अब इस ग्राम में कितनी चीटियां समा जाएंगी? शायद हजारों..। कितना अज्ञान हैं आत्मा के विषय में विज्ञान। जैसे लोग कहते है कि आत्मा घटता-बढ़ता है। हाथी मे जाएगा तो बढ़ जाएगा और चीटी में जाएगा तो घट  जाएगा। सत्य वैदिक सिद्धान्त यह है कि जीवात्मा अपरिणामी होने से घटता-बढ़ता नही है वह अभौतिक वस्तु होने से स्थान भी नहीं घेरता। एक सुई की नोक में विश्व के सभी जीवात्मा समा सकते हैं।

Sunday, 24 April 2016

मोक्षदायिनी प्रार्थना-आराधना


हम ईश्वर की प्रार्थना करें और उसकी शरण में आएं। लेकिन इसके लिए हमें वह मार्ग और उपाय पता होना चाहिए। इस मार्ग पर किस तरह से प्रस्थान करना चाहिए और कैसे हम अपनी मंजिल यानी मोक्ष को प्राप्त करें। इसकी शुरुआत हम इन मंत्रों और प्रार्थनाओं से करते हैं।
ओ3म भूर्भुव स्व:।  तत्सुवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न: प्रचोदयात्।। (यजु. 36-3)
ओ3म यह मुख्य परमेश्वर का नाम है, जिस नाम के साथ अन्य सब नाम लग जाते हैँ। जो प्राणों का भी प्राण है,  सब दुखों से छुड़ाने वाला, सुख स्वरूप और अपने उपासकों को सब सुखों की प्राप्ति कराने वाला है, उस सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले, सूर्यादि प्रकाशकों के भी प्रकाशक,समग्र एेश्वर्य के दाता, कामना करने योग्य, सर्वत्र विजय कराने  वाले परमात्मा का, जो अतिश्रेष्ठ ,ग्रहण और ध्यान करने योग्य,सब क्लेशों को भस्म करने वाला, पवित्र,शुद्ध स्वरूप है,  उसको हम लोग,  धारण करे,यह जो परमात्मा,हमारी, बुद्धियों को उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों की ओर प्रेरित करे। इसी प्रयोजन के लिए इस जगदीश्वर की स्तुति प्रार्थनोपासना करना और इससे भिन्न और किसी को उपास्य,इष्टदेव,उसके तुल्य वा उससे अधिक नहीं मानना चाहिए।
आइए अब हम परमेश्वर से सच्ची लगन लगाने के लिए उसकी प्रार्थना करें। प्रार्थना करने के लिए जिन मन्त्रों का उच्चारण करना होगा, हम सम उन्हीं मन्त्रों को स्वभाषित करें।
ओ3म विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।
यद्भद्रं तन्न आ सुव।। 1।। (यजु. 30-3)
तू सर्वेश सकल सुखदाता,शुद्ध स्वरूप विधाता है।
उसके कष्ट नष्ट हो जाते, जो तेरे ढिंग आता है।
सारे दुर्गुण दुव्र्यसनों से, हमको नाथ बचा लीजे।
मंगलमय गुण कर्म पदार्थ, प्रेम सिन्धु हमको दीजे।
हिरण्यगर्भ: समवत्र्तताग्रे भूतस्यजात: पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवी द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 2।।
                                                            (यजु. 13-4)
तू ही स्वयं प्रकाश सुचेतन, सुखस्वरूप शुभत्राता है।
सूर्य-चन्द्र लोकादिक को तू, रचता और टिकाता है।
पहिले था अब भी तू ही है,घट-घट में व्यापक स्वामी।
योग भक्ति तप द्वारा तुझको, पावें हम अन्तर्यामी।
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवा: ।
यस्यच्छायाअमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 3।।
                                                                   (यजु. 25-13)
तू ही आत्मज्ञान बल दाता, सुयश विज्ञ जन गाते हैं।
तेरी चरण-शरण ें आकर, भवसागर तर जाते हैं।
तुझको ही जपना जीवन है, मरण तुझे बिसराने में।
मेरी सारी शक्ति लगे प्रभु, तुझ से लगन लगाने में।
य: प्राणतो निमिषतो महित्वैग इद्राजा जगतो बबूव।
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 4।। 
                                                                    यजु. 23-2) 
तू न अपनी अनुपम माया से, जग ज्योति जगाई है।
मनुज और पशुओं को रचकर, निज महिमा प्रगटाई है।
हपने हिय-सिंहासन पर, श्रद्धा से तुझे बिठाते हैं।
भक्ति-भाव की भेंटें लेकर, तब चरणों में आते हैं।
येन द्योरुग्रा पृथिवी च दृढ़ा येन स्व स्तभितं येन नाक:।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 5।। 
                                                                  (यजु. 32-6)
तारे रवि चन्द्रादिक रचकर, निज प्रकाश चमकाया है।
धरणी को धारण कर तूने,कौशल अलख लखाया है।
तू ही विश्व विधाता पोषक,तेरा ही हम ध्यान करें।
शुद्ध भाव से भगवन ! तेरे, भजनामृत का पान करें।
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव ।
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोअस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्।। 6।। 
                                                             (ऋग. 10-121-10)
तुझसे भिन्न न कोई जग में, सब में तू ही समाया है।
जड़-चेतन सब तेरी रचना,तुझमें आश्रय पाया है।
हे ! सर्वोपरि विभो विश्व का, तूने साज सजाया है।
हेतु रहित अनुराग दीजिये, यही भक्त को भाया है।
स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त।। 7।। 
                                                             (यजु. 32-10)
तू गुरु है प्रजेश भी तू है, पाप-पुण्य फल दाता है।
तू ही सा-बन्धु मम तू ही है,तुझसे ही सब नाता है।
भक्तों को इस भव बन्धन से ,तू ही मुक्त कराता है।
तू है अज अद्वैत महाप्रभु,सर्वकाल का ज्ञाता है।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं निधेम।। 8।। 
                                                                 (यजु. 40-16)
तू है स्वयं प्रकाशरूप प्रभु,सबका सिरजनहार तू ही।
रसना निशि-दिन रहे तुम्हीं को, मन में बसना सदा तू ही।
अघ-अनर्थ से हमें बचाते,रहना हरदम दयानिधान।
अपने भक्त जनों को भगवन! दीजे यही विशद वरदान।

ओ3म