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Friday, 13 May 2016

कटु सत्य

जो भाग्य में है, वो भाग कर आएगा
जो नहीं है, वह आकर भी भाग जाएगा।

जिंदगी को इतना सीरियस लेने की जरूरत
नहीं है यारों
यहों से जिन्दा बचकर कोई नहीं जाएगा।
एक सत्य यह है कि अगर जिंदगी
अच्छी होती तो
हम इस दुनिया में रोते-रोते हुए न आते
मगर मीठा सत्य यह भी है कि
अगर जिंदगी बुरी होती तो
लोगों को रुलाकर न जाते...
वाह रे मानव तेरा स्वभाव..

लाश को हाथ लगाता है तो नहाता है..
पर बेजुबान जीव को मार के खा जाता है।
यह मंदिर-मस्जिद भी क्या गजब की जगह है
दोस्तों
जहां गरीब अंदर और अंदर भीख मांगता है

विचित्र दुनिया का कठोर सत्य है यह
बारात में दूल्हा सबसे पीछे और
दुनिया आगे चलती है
मय्यत में जनाजा आगे
और दुनिया पीछे चलती है
यानि दुनिया खुशी में आगे और
दुख में पीछे हो जाती है

अजब तेरी दुनिया-गजब तेरा खेल
मोमबत्ती जलाकर मुर्दों को याद करते हैं
और मोमबत्ती बुझा कर जनम दिन मनाते हैं

मै कौन हूं

सर्वप्रथम इस पश्न पर विचार किया जाए कि मैं कौन हूं? यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से पूछे कि तू कौन है? तो वह उसे उत्तर में अपना नाम बताएगा। मान लीजिए कि वह उत्तर में यह कहता है कि मैं श्वेतांक हूं। इसके बाद यदि प्रश्नकर्ता यह पूछे कि श्वेतांक तुम्हारे शरीर के किस अंग का नाम है? तो वह निरुत्तर हो जाएगा, क्योंकि शरीर कि किसी अंग का नाम श्वेतांक नहीं है। शरीर के अंगों के नाम तो शिर,नेत्र,ग्रीवा,नाक,कान,हाथ,पैर और उदर आदि हैं।
हम मनुष्यों ने अपनी-अपनी भाषा में प्रत्येक वस्तु का नाम रखा हुआ है। जिस प्रकार एक वृक्ष केविभिन्न अंगों के नाम -जड़,तना,डाल,पत्ते,पुष्प,फल आदि होते हें,उसी प्रकार शरीर के अंगों के नाम भी अलग-अलग हैं। जिस प्रकार जड़,तना,डाल,पत्ता ,फूल आदि के संयुक्त रूप को वृक्ष कहते हैं। और उस वृक्ष को भी उसकी विशेषताओं के आधार पर आम,नीम,वट,पीपल,अमरूद आदि का वृक्ष कहते हेँ। इसी प्रकार विभिन्न्न अंगों वालते मानव शरीर को विभिन्न नामों से पुकारते हैं।
मैं शब्द का अर्थ -आत्मा । यदि कोई व्यक्ति कहे कि मैं बहुत दुर्बल हो गया हंू तो यहां मैं का अर्थ है-मेरा या मुझ आत्मा का शरीर, परन्तु यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के समय यह कहे कि अच्छा मैं जा रहा हूं तो यहां मैं का अर्थ आत्मा है।
प्रत्येक प्राणी के शरीर में एक अदृश्य शक्ति छिपी रहती है। जिसे आत्मा कहते हें। यह आत्मा ही इस शरीर को चला रहा है। इससे सम्पूर्ण कार्य करा रहा है। यह शरीर स्वयं कुछ भी करने में असमर्थ है। शरीर में जब तक आत्मा का निवास रहता है तभी तक यह शरीर देखता है, सुनता है, हंसता-बोलता है, चलता-फिरता है,भोग-बिलास करता है, अध्ययन-लेखन करता है, योग साधना करता है, सुख-दुख का अनुभव करता है और स्वस्थ-सुन्दर रहता है परन्तु जैेसे ही आत्मा इस शरीर से निकल जाता है वैसे ही यह शरीर एक ओर लुढ़क जाता है। इसका देखना,हंसना-बोलना,चलना-फिरना आदि सभी कार्य बन्द हो जाते हैं और यह अत्यधिक सुन्दर शरीर गलने-सडऩे लगता है।
यदि शरीर अकेला होता या इसमें आत्मा की कोई सत्ता न होती तो यह शरीर इस प्रकार निष्क्रिय क्यों हो जाया करता। मृत्यु क बाद शरीर तो पहले जैसा रहता है, परंतु संसार के सभी चिकित्सक एवं वैज्ञानिक मिलकर भी उसे जीवित नहीं कर सकते, न आज तक कर सके हैं और न भविष्य में कभी कर सकेंगे। यह शाश्वत सत्य है और जीवन-नियम मानव के हाथ या अधिकार से बाहर है। इस प्रकार इस शरीर के अन्दर कोई एेसी शक्ति विद्यमान रहती है, जो परमात्मा की आज्ञा से इस शरीर को धारण करती है तथा उसकी आज्ञा से इस शरीर को छोड़ देती है। यह शक्ति ही आत्मा है। यह आत्मा ही मैं हूं। अत: मैं कौन हूं? इस प्रश्न का उत्तर है-मैं आत्मा हूं, जो शरीर में रहता हूं। हमें यह जान लेना भी आवश्यक है कि आत्मा कैसा है, कहां  रहता है और क्या करता है।
जब यह ज्ञात हो गया कि मैं आत्मा हूं तो यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि मैं कैसा हूं? अर्थात आत्मा का स्वरूप कैसा है? वेद तथा वेदानुकूल धर्म-ग्रन्थों में आत्मा के स्वरूप का वर्णन विस्तारपूर्वक विद्यमान है। 

Thursday, 12 May 2016

मानव जीवन का रहस्य


परमपिता परमात्मा की कृपा से जब मनुष्य में सद्बुद्धि जाग्रत होती है, तो वह इस अद्भुत मानव-शरीर एवं जीवन को देखकर यह विचारता है कि मैं कौन हूं्र, मैं कहां से आया हूं, मैं इस पृथ्वी पर क्यों आया हूं, और इस जीवन के बाद मैं कहा चला जाऊंगा। यह विचार प्रत्येक मनुष्य के मन में उत्पन्न नहीं होता क्योंकि जो व्यक्ति मात्र खाने-पीने ,सोने-जागने,धन-संग्रह करने, भोग-विलास करने, शरीर को सजाने-संवारने या अन्य सांसारिक कार्यो में ही लगे रहते हें, जो सदैव इन कार्यों को करने की ही चिन्ता करते रहते हैंं। इस संसार को अद्भुत रचना-प्रक्रिया को देखकर चकित नहीं होते और इसके रचयिता का चिन्तन नहीं करते,उनके मन  में ये प्रश्न उत्पन्न नहीं होते । जिस व्यक्ति के मन में ये प्रश्न उत्पन्न होते हें और जो उनका उत्तर पाना चाहता है, वह व्यक्ति निश्चय ही सौभाग्यशाली है। इसके विपरीत जिसके मन में ये प्रश्न उत्पन्न नहीं होते या उत्पन्न होने पर भी जो इनका उत्तर पाना नहीं चाहता, वह व्यक्ति अभागा है और उसका यह जीवन व्यर्थ है।
क्या है आत्मा का गूढ़ रहस्य
हम जब अध्यात्म की बात करते हैं तो हमारे सामने दो चीजें सामने आतीं हैं। एक ईश्वर,परमात्मा और दूसरी आत्मा या जीवात्मा। यदि हम प्रैक्टिकल बात करें तो हम देखते हैं कि आजकल के अर्थ युग में आधुनिक जीवनशैली में भागमभाग में इतना समय ही नहीं मिल पाता है कि मनुष्य अध्यात्म या आत्मा व परमात्मा के बारे में चर्चा कर सके। आज का मनुष्य आत्मा-परमात्मा के बारे में बात तभी करता है जब या तो वह किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा में जाता है या अंत्येष्टि स्थल पर लिखे गीता व अन्य ग्रंथों के वाक्यों पर चर्चा करने के बाद फिर भूल जाता है। इस कटु सत्य हमें स्वीकार करना होगा। सत्य है कि हम मोक्ष या मुक्ति के बारे में आसानी से बात करने लगते हैं लेकिन इसे पहले हमें आत्मा और परमात्मा के गूढ़ रहस्य के बारे में बात करनी होगी। आत्मा के दो प्रकार हैं-एक अणु आत्मा और दूसरा विभु आत्मा। कठोपनिषद् में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है-

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतु: पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमात्मन:।।

परमात्मा तथा अणु आत्मा दोनो शरीर रूपी वृक्ष में जीव के हृदय में विद्यमान हैं और इनमें जो समस्त इच्छाओं तथा शोकों से मुक्त हो चुका है, वही ईश्वर की कृपा से आत्मा की महिमा को जान सकता है।

आत्मा के बारे में रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं:-
ईश्वर अंश जीव अविनाशी,चेतन अमल सहज सुख राशि।।

श्रीमदभगवदगीता के दूसरे अध्याय के 20 श्लोक में लिखा है

न जायते म्रियते वा कदाचिन्, नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु। वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म लेगा। वह अजन्मा, नित्य,शाश्वत तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर मारा नहीं जाता।

जो जीवात्मा ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, वह अपनी शक्ति, गुण,स्वरूप को जाने बिना ईश्वर को नहीं जान सकता। जब व्यक्ति शीशे में देखता है तो विचारता है कि मैं पुरुष वा स्त्री हूं। काला,गोरा,नाटा,बालक,वृद्ध हूं । यह मिथ्या ज्ञान है। परन्तु मैं स्त्री,पुरुष आदि शरीर वाला हूं यह विचार करना चाहिए। आज व्यक्ति ने पृथ्वी का चप्पा-चप्पा खोज मारा,चन्द्रमादि ग्रहों तक पहुंच गया है। प्राकृतिक यानी भौतिक अनेक पदार्थों  को जान लिया है परन्तु स्वयं के बारे में मानव को बहुत अल्पज्ञान है।
परिभाषाएं व सिद्धान्त बदल जाने से विचार और व्यवहार बदल जाते हैं। कुरान-बाइबिल में आत्मा के बारे में बहुत कम बातें लिखीं हैं। जो लिखी हैं वे भी प्राय: गलत हैं। जैसे मनुष्य को छोड़कर किसी में आत्मा नहीं मानी। स्त्री में पूरी आत्मा मानते ही नहीं हैं। पाकिस्तान में स्त्री को आधी आत्मायुक्त मानने से उसे चुनाव में आधे वोट का अधिकार है। अग्नि आदि भौतिक पदार्थ के बारे में हमारा जैसा व्यावहारिक ज्ञान है, वैसा आत्मा के बारे में भी हो। मुझ आत्मा को अस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती इतना समझ लेने मात्र से कितनी शक्ति व निर्भयता आ जाती है। दयानन्द पर विष प्रयोग हुआ,मतीदास को चीरा गया। वैरागी की खाल नुचवाई गई,गुरु के बच्चे को दीवार में चिनवाए गए, कढ़ाई में तले गए, परन्तु उन्होंने आत्मा का सच्चा नित्य स्वरूप जानकर काहा कि हमारे आत्मा का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। उन्होंने अपने  अनित्य शरीर को आत्मा नहीं माना। आत्मा को जानकर व्यक्ति महान् सामथ्र्यवान् हो जाता है। यह वास्तविक ज्ञान के कारण है। जीवात्मा का कोई रंग-रूप नहीं,कोई भार नहीं है। जैसे भौतिक वस्तुओं में रंग,रूप,स्पर्श,लम्बाई,चौड़ाई आदि गुण पाये जाते हैं,वैसे जीवात्मा में नहीं हैं।
एक रोचक बात,एक पुस्तक है  501 आश्चर्यजनक तथ्य उसमें जीवात्मा का भार लिखा है कि जीवात्म 21 ग्राम का है। कुछ वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया। मरते हुए एक व्यक्ति को बॉक्स में बन्द करके तुला में तोला गया । थोड़े काल में वह मर गया, अर्थात आत्मा निकल गई उसे फिर तोला गया तो 21 ग्राम भार कम हुआ। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि जीवात्मा 21 ग्राम का है। अब इस ग्राम में कितनी चीटियां समा जाएंगी? शायद हजारों..। कितना अज्ञान हैं आत्मा के विषय में विज्ञान। जैसे लोग कहते है कि आत्मा घटता-बढ़ता है। हाथी मे जाएगा तो बढ़ जाएगा और चीटी में जाएगा तो घट  जाएगा। सत्य वैदिक सिद्धान्त यह है कि जीवात्मा अपरिणामी होने से घटता-बढ़ता नही है वह अभौतिक वस्तु होने से स्थान भी नहीं घेरता। एक सुई की नोक में विश्व के सभी जीवात्मा समा सकते हैं।

Sunday, 24 April 2016

मोक्षदायिनी प्रार्थना-आराधना


हम ईश्वर की प्रार्थना करें और उसकी शरण में आएं। लेकिन इसके लिए हमें वह मार्ग और उपाय पता होना चाहिए। इस मार्ग पर किस तरह से प्रस्थान करना चाहिए और कैसे हम अपनी मंजिल यानी मोक्ष को प्राप्त करें। इसकी शुरुआत हम इन मंत्रों और प्रार्थनाओं से करते हैं।
ओ3म भूर्भुव स्व:।  तत्सुवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न: प्रचोदयात्।। (यजु. 36-3)
ओ3म यह मुख्य परमेश्वर का नाम है, जिस नाम के साथ अन्य सब नाम लग जाते हैँ। जो प्राणों का भी प्राण है,  सब दुखों से छुड़ाने वाला, सुख स्वरूप और अपने उपासकों को सब सुखों की प्राप्ति कराने वाला है, उस सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले, सूर्यादि प्रकाशकों के भी प्रकाशक,समग्र एेश्वर्य के दाता, कामना करने योग्य, सर्वत्र विजय कराने  वाले परमात्मा का, जो अतिश्रेष्ठ ,ग्रहण और ध्यान करने योग्य,सब क्लेशों को भस्म करने वाला, पवित्र,शुद्ध स्वरूप है,  उसको हम लोग,  धारण करे,यह जो परमात्मा,हमारी, बुद्धियों को उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों की ओर प्रेरित करे। इसी प्रयोजन के लिए इस जगदीश्वर की स्तुति प्रार्थनोपासना करना और इससे भिन्न और किसी को उपास्य,इष्टदेव,उसके तुल्य वा उससे अधिक नहीं मानना चाहिए।
आइए अब हम परमेश्वर से सच्ची लगन लगाने के लिए उसकी प्रार्थना करें। प्रार्थना करने के लिए जिन मन्त्रों का उच्चारण करना होगा, हम सम उन्हीं मन्त्रों को स्वभाषित करें।
ओ3म विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।
यद्भद्रं तन्न आ सुव।। 1।। (यजु. 30-3)
तू सर्वेश सकल सुखदाता,शुद्ध स्वरूप विधाता है।
उसके कष्ट नष्ट हो जाते, जो तेरे ढिंग आता है।
सारे दुर्गुण दुव्र्यसनों से, हमको नाथ बचा लीजे।
मंगलमय गुण कर्म पदार्थ, प्रेम सिन्धु हमको दीजे।
हिरण्यगर्भ: समवत्र्तताग्रे भूतस्यजात: पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवी द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 2।।
                                                            (यजु. 13-4)
तू ही स्वयं प्रकाश सुचेतन, सुखस्वरूप शुभत्राता है।
सूर्य-चन्द्र लोकादिक को तू, रचता और टिकाता है।
पहिले था अब भी तू ही है,घट-घट में व्यापक स्वामी।
योग भक्ति तप द्वारा तुझको, पावें हम अन्तर्यामी।
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवा: ।
यस्यच्छायाअमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 3।।
                                                                   (यजु. 25-13)
तू ही आत्मज्ञान बल दाता, सुयश विज्ञ जन गाते हैं।
तेरी चरण-शरण ें आकर, भवसागर तर जाते हैं।
तुझको ही जपना जीवन है, मरण तुझे बिसराने में।
मेरी सारी शक्ति लगे प्रभु, तुझ से लगन लगाने में।
य: प्राणतो निमिषतो महित्वैग इद्राजा जगतो बबूव।
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 4।। 
                                                                    यजु. 23-2) 
तू न अपनी अनुपम माया से, जग ज्योति जगाई है।
मनुज और पशुओं को रचकर, निज महिमा प्रगटाई है।
हपने हिय-सिंहासन पर, श्रद्धा से तुझे बिठाते हैं।
भक्ति-भाव की भेंटें लेकर, तब चरणों में आते हैं।
येन द्योरुग्रा पृथिवी च दृढ़ा येन स्व स्तभितं येन नाक:।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 5।। 
                                                                  (यजु. 32-6)
तारे रवि चन्द्रादिक रचकर, निज प्रकाश चमकाया है।
धरणी को धारण कर तूने,कौशल अलख लखाया है।
तू ही विश्व विधाता पोषक,तेरा ही हम ध्यान करें।
शुद्ध भाव से भगवन ! तेरे, भजनामृत का पान करें।
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव ।
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोअस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्।। 6।। 
                                                             (ऋग. 10-121-10)
तुझसे भिन्न न कोई जग में, सब में तू ही समाया है।
जड़-चेतन सब तेरी रचना,तुझमें आश्रय पाया है।
हे ! सर्वोपरि विभो विश्व का, तूने साज सजाया है।
हेतु रहित अनुराग दीजिये, यही भक्त को भाया है।
स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त।। 7।। 
                                                             (यजु. 32-10)
तू गुरु है प्रजेश भी तू है, पाप-पुण्य फल दाता है।
तू ही सा-बन्धु मम तू ही है,तुझसे ही सब नाता है।
भक्तों को इस भव बन्धन से ,तू ही मुक्त कराता है।
तू है अज अद्वैत महाप्रभु,सर्वकाल का ज्ञाता है।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं निधेम।। 8।। 
                                                                 (यजु. 40-16)
तू है स्वयं प्रकाशरूप प्रभु,सबका सिरजनहार तू ही।
रसना निशि-दिन रहे तुम्हीं को, मन में बसना सदा तू ही।
अघ-अनर्थ से हमें बचाते,रहना हरदम दयानिधान।
अपने भक्त जनों को भगवन! दीजे यही विशद वरदान।

ओ3म

Friday, 22 April 2016

व्यंग्य पुराण-पागलखाने में नारदजी का ताण्डव

सुपरिटेंडेंट ने नारदजी के खाने का इंतजाम किया। इसके बाद नारदजी ने कहा अब आराम करना चाहूंगा। वह बोला आपने कहा कि मुझे कुछ और बताएंगे। नारदजी बोले कि इतनी जल्दी क्या है? मैं तो यहां आराम से रहने वाला हूं और तुम भी कहीं जा नहीं रहे हो,रोज-रोज कुछ जानकारी देता रहूंगा। ठीक है अब तुम भी खा-पीकर आराम करो। ठीक है फिर कल सुबह तो बताएंगे। हां-नारदजी बोले। नामालूम ने पूछा कि यह क्या कह रहा है? नारदजी बोले,अपनी मौत तलाश रहा है। इसने अपने जीवन इतने पाप किए हैं कि इससे इसे जल्दी मुक्ति नहीं मिलने वाली फिर भी चाहता है कि सब कुछ अच्छा हो जाए। दरअसल पागलों के साथ रहकर यह पागल हो गया है। भौतिक सुख के लिए अपनी जान कुर्बान करने पर तुला है। नामालूम ने फिर पूछा कि क्या मुझे भी कुछ बताओगे,बाबाजी? नारदजी बोले,ज्योतिष विद्या हंसी-मजाक नहीं हैं,आराधना है। हर समय सरस्वती हमारी जुबान में बैठकर बोलने के लिए तैयार नहीं रहतीं हैं। अच्छा,जानना चाहते हो तो चलो तुम भी कल सुबह ही पूछ लेना। इसके बाद नारदजी ने आंखें बंद करके लेट गए। आराम करने के बाद उठे तो काफी विचलित दिखे। नामालूम ने पूछा कि बाबा क्या बात है? आप कुछ परेशान दिख रहे हैं। बताइए मैं आपकी क्या सेवा करूं? उन्होंने कहा कि नामालूम, भाई मेरी परेशानी का कारण यह है कि मैं जब स्वर्ग लोग में रहता था तो वहां पर सभी जगह भ्रमण करता रहता था। सारी जगह की खबरें मिल जाया करतीं थीं। अब जबसे तुम्हारे साथ आया हूं पहली बार तो फुर्सत मिली है तो खबरों को लेकर मन में जिज्ञासा बढ़ रही है। अब समझ में नहीं आता कि क्या करूं? बाबाजी मैं इस मामले में आपकी कोई मदद नहंीं कर सकता हूं क्योंकि मैं काला अक्षर भैंस बराबर हूं। लेकिन मेरे दिमाग में एक आइडिया आ रहा है कि यदि आपको खबरों की जानकारी चाहिए तो अखबार पढिय़े। अखबार आपका भक्त सुपरिटेंडेंट लाकर देगा। उससे ही मांगिये। नारदजी बोले तो ऐसा कर तू ही सुपरिटेंडेंट के पास जाकर कह ना कि बाबा जी अखबार मंगा रहे हैं। ठीक है कहकर नामालूम सुपरिटेंडेंट के पास गया और कहा। उसने कहा कि अखबार आता तो है, लेकिन सुबह अब कहां और किस हाल में होगा पता नहीं फिर भी प्रयास करता हूं। बड़ी कोशिशों के बाद अखबार के कुछ टुकड़े बटोर कर उसने नामालूम को दे दिए और कहा कि बाबाजी से कहो कि आज इसी के काम चला लें बाकी सुबह बढिय़ा अखबार मिल जाएगा। नामालूम ने बाबाजी को अखबार के टुकड़े दे दिए और कहा कि सुपरिटेंडेंट ने कहा है कि समूचा अखबार सुबह ही मिल पाएगा। उन्होंने इन टुकड़ों में लिखी हुई खबरें पढ़ीं तो उनका सर ही चकरा गया। कही हत्या तो कहीं भ्रूण हत्या,चोरी,चकारी,लूट-पाट,छीना-झपटी,लड़ाई-झगड़ा, पति-पत्नी के बीच झगड़े,आत्महत्या,संपत्ति के लिए बाप-बेटे में जंग तो कहीं बाप ने किया बेटे का कत्ल तो कहीं बेटे ने बाप को मौत के घाट उतारा। वह तो माथा ही पकड़ कर बैठ गए । थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा कि नामालूम क्या यही खबरेंं हैं। बाबाजी यह तो अखबार के टुकड़े में कुछ नमूने हैं बाकी कल सुबह के अखबार में पढ़ लेना। नारदजी ने कहा कि अखबारों में भगवान विष्णु या राम या कृष्ण के बारे में कुछ नहीं छपता। उसने कहा कि हमने तो पहले ही कहा कि हम तो अंगूठा टेक हैं छपता भी होगा तो हमें कुछ नहीं मालूम। शाम को जब सुपरिटेंडेंट नारदजी से मिलने आया तो उन्होंने अखबार में छपी इन खबरों पर अपना दर्द जताया और साथ ही यह भी कहा कि भगवान की खबरें नहीं छपतीं हैं क्या? उसने कहा कि छपती जरूर होंगी क्योंकि ये अखबार वाले किसी को नहीं छोड़ते। तो भगवान को क्या छोड़ेंगे। सुबह का अखबार आएगा तो सबसे पहले आपके पास ही भेज देंगे।
सुबह हुई तो फिर वहीं कार्यक्रम शुरू हो गया। नारदजी ने ध्यान लगाया और उसके बाद जब उनकी तंद्रा टूटी तो सुपरिटेंडेंट मिलने आ गया और करने लगा तकादा। बच्चों की तरह ठुनक कर बोला बाबा जी अब तो सुबह हो गई अब तो बताइये न। आपने कहा कि सुबह बताएंगे। नारदजी बोले कि आपने भी कहा कि सुबह अखबार देंगे मेरा मन खबरों को लेकर बहुत व्याकुल है। उसने कहा कि बस अखबार आता ही होगा जैसे आ जाएगा वैसे ही भेज देेंगे। बस अब देर मत लगाइये और मुझे बताइये। नारदजी ने काफी सोच विचार कर कहा कि एक काम कर यदि तू वास्तव में अपना कल्याण चाहता है तो जीवन का प्रायश्चित कर ले क्योंकि तू ही याद कर ले कि अपने जीवन में कितने पाप किए हैं? वह सिर झुकाकर बैठ गया। बोला कि मैं किस तरह से प्रायश्चित करूं? तेरे हाथ में इतना बड़ा पागलखाना है। न जाने कितने यतीम होंगे और न जाने कितने पागलों के बच्चे इधर-उधर भटक रहे होंगे उनका सही इलाज करके उनके परिवार को मिला दे। यही तेरे लिए काफी है। इनकी दुआएं ले तेरा सबकुछ ठीक हो जाएगा। किसी का हक मत मार। जी अच्छा कह कर सुपरिटेंडेंट चुप हो गया। नारदजी ने कहा कि आज इतना ही बस फिर देखूंगा कि तुझे कब क्या बताना है।ठीक है। हां जाते जाते अखबार भिजवा देना। अखबार तो साथ ही लाया था। देखो आज इसमें रामजी और रामायण की खबर भी छपी है। नारदजी ने इतना सुनते ही उसके  हाथ से अखबार झपट लिया। अखबार में आज की रामायण कालम पढ़ते ही नारदजी चौंक पड़े। रामायण और उसकी घटनाओं पर छपे व्यंग्य को देखकर नारदजी का मुंह लाल हो गया। धीरे-धीरे वह बड़बड़ाने लगे। फिर जोर-जोर से चिल्लाने चीखने लगे। उनकी चीख पुकार सुनकर इकट्ठे होने लगे। नारदजी से पूछने लगे कि अखबार में ऐसा क्या छपा है कि जिसे पढ़ कर आप इतने नाराज हो गए। वे बोले हमारे प्रभु श्रीराम का घोर अपमान,नहीं था ऐसा अनुमान, माफ कीजिये श्रीमान, नहीं कर पाऊंगा इस पर फिर से ध्यान। अगर आपको जानना ही चाहते हैं तो ये है मेरा साथी नामालूम यह पढ़कर आपको बताएगा। वह बोला बाबा मैं तो पहले ही बता चुका हूं कि मैं हूं अंगूठा टेक । मेरे लिए अखबार में लिखे सारे काले अक्षर भैंस के समान एक जैसे दिखते हैं। इतनी बात सुनते ही भीड़ में से एक अजूबा सा व्यक्ति सामने आया और बोला सुनो जी श्रीमान मेरा नाम है बावला अरमान। मगर ईंट-पत्थर मारने वाला पागल नहीं हूं,थोड़ा सा खिसक गया है तो यहां आ गया हूं। बस अब ठीक होने वाला हूं,ठीक होते ही अपनी लैला के पास चला जाऊंगा। आप सबसे कहूंगा टाटा एण्ड बाय-बाय। तभी भीड़ में से आवाज आई कि अखबार पढ़ेेगा कि अपनी राम कहानी सुनाएगा। नहीं दोस्तो-मैं थोड़ा-घना पढ़ा-लिखा भी हूं । अब अखबार पढ़ कर सुनाता हूं। तो सुनिये दोस्तो।अखबार ने लिखा है कि आज का जमाना होता तो राजा दशरथ के शब्दभेदी बाण से श्रवण कुमार की मृत्यु को इस तरह लिखा जाता कि राजा दशरथ ने की श्रवण कुमार की हत्या, एफआईआर दर्ज। माता-पिता अनशन पर । बाद में दम तोड़ा। कैकेयी द्वारा राजा दशरथ से वरदान मांग कर राम को वनवास भेजने को यूं लिखा जाता अयोध्या की कुर्सी पर राजा-रानी में खटपट। रानी जीतीं भरत को कुर्सी दिलाई कब्जे की आशंका को खत्म करने के लिए राम को किया चौदह बरस के लिए राज्य बदर। केवट द्वारा चरण धोने की घटना को यूं कहा जाता केवट से चरण धुलवाने पर दलित नेता आग-बबूला। कहा ये है दलितों का अपमान। आयोग से गुहार। ताड़का वध और सूर्पणखा दण्ड पर लिखा जाता ताड़का वध और सूर्पणखा की नाक-कान कटाई के विरोध में महिला आयोग का अयोध्या में प्रदर्शन जारी क्योंकि जंगल में राम-लक्ष्मण हुए गुम। अखबार ने चीखने वाले चैनल की खबर लेते हुए लिखा कि राजा दशरथ की अंतिम यात्रा में स्वयं राजा दशरथ मौजूद-टीवी चैनल। फिर अखबार ने बिना संदर्भ क घटनाओं को इस प्रकार लिखना शुरू कर दिया। बालि की हत्या की शक की सुई श्रीराम पर ठहरी, सप्ताह भर में सीबीआई पेश करेगी जांच रिपोर्ट। छह माह तक कोख में रावण को दबा कर घूमने के जुर्म में बाली के खिलाफ इन्द्रजीत ने मुकदमा दायर किया। सोने का हिरन मारने पर श्रीराम को वन विभाग से मिली चेतावनी। श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता के अपहरण का मामला दर्ज कराया।समुद्र पर असेवैधारिक सेतु बनाने पर नल व नील से सीबीआई करेगी पूछताछ। अशोक वाटिका उजाडऩे,युवराज अक्षय कुमार को मारने व लंका में आग लगाने के जुर्म में रावण वीर हनुमानको बंदी बनाया। हिमालय वासियों ने पर्वत श्रंखला से एक पर्वत के चोरी हो जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई। अंगद ने लंका क राजा का उन्हीं के निवास स्थान में जाकर किया अपमान। विभीषण पर देशद्रोह का आरोप,हुए तड़ीपार। श्रीराम ने किया रावण का फर्जी एनकाउंटर। भारत व श्रीलंका सरकार की दूरियां बढ़ीं। सीता से अग्नि परीक्षा मांगने पर महिला आयोग ने श्रीराम की कड़े शब्दों में निंदा की। सुप्रीम कोर्ट ने जनता की मांग पर श्रीराम व उनकी सेना को सभी आरोपो ंसे मुक्त किया। भगवान श्रीराम जब वन से अयोध्या पुष्पक विमान से लौट रहे थे तो देखा कि जहां अयोध्या सीमा पर आगे बढ़े थे वहां कुछ लोग कीर्तन भजन कर रहे थे। उन्होंन अपना विमान उतरवाया तो देखा कि किन्नर श्रीराम का कीर्तन करने में मस्त थे। तभी श्रीराम ने कहा कि अरे आप लोग चौदह वर्ष से यहीं भजन कीर्तन कर रहे हों। प्रभु आपने सबसे विदा लेते हुए कहा कि अच्छा अयोध्या के नर-नारियों आपसे विदा लेता हूं आप लोग अपने-अपने घर जाइये। हम तो नर में न नारी में। हमने सोचा कि प्रभु ने हमें तो अपने घर जाने की आज्ञा दी नहीं इसलिए हम लोग आपका गुणगान कर रहे हैं। ठीक है अब चलो। खुश होकर सभी चल दिए। क्रमश:

Monday, 18 April 2016

व्यंग्य पुराण-पागलखाने में नामालूम जमकर रोया

नारद जी और उनके साथी नामालूम पागलखाने की गाड़ी से पागलखाने पहुंच गए। उन्हें पता ही नहीं चला कि वह कब पागलखाने में दाखिल हो गए क्योंकि गेट खुला और गाड़ी सीधे सुपरिटेंडेंट के दफ्तर के बाहर रुकी। प्रहरियों ने पिंजड़ेनुमा गाड़ी का दरवाजा खोला और दोनों लोगों से बाहर आने को कहा तो नारदजी चौंक पड़े,क्या वास्तव में पागलखाने आ गए। प्रहरी ने कहा जी हां। इसे पागलखाना कहकर अपमानित न करिये। यह भी एक तरह का अस्पताल है,मेडिकल कालेज है। सच कहें तो आम अस्पतालों से हटकर अस्पताल है। आम अस्पतालों के मरीजों को अन्य डाक्टर,वैद्य,हकीम, पंसारी और झोलाछाप डॉक्टर मिल भी जाते हैं परन्तु इस तरह के अस्पतालों के मरीजों को सिर्फ यहीं आना पड़ता है। प्रहरी का बखान सुनकर नारदजी बोले पीछे हट,हमें उतरने दे। आओ नामालूम तुम भी आओ। उतरते ही लगभग एक दर्जन लोगों ने दोनों को घेर लिया। इसके साथ ही पूरे पागल खाने की बैरकों और बारामदों में मौजूद मरीजों में खासी हलचल मच गई। सबसे पहले तो सुपरिटेंडेंट आया और उसने नारद जी का स्वागत करते हुए कहा कि बहुत पहुंचे हुए संत-ज्ञानी मालूम पड़ते हो। हाथ-वाथ देख लेते हो। कुंडली पढ़ लेते हो या ढोंगी और भिक्षा मांगने वाले साधु हो। इस पर नारद ने मौन धारण कर लिया। इतने में सुपरिटेंडेंट की नजर उनके सर व शरीर पर आई चोटों की ओर पड़ी। अरे यह क्या हुआ? इनमे सिर का बहा हुआ खून भी सूख गया लगता है कि इसी के कारण इनके दिमाग पर असर पड़ा है। उसने अपनी जेब से एक सीटी निकाली और जोर-जोर से बजानी शुरू कर दी। इतने में कई सफेद कोट वाले लड़के और लड़कियां यानी वार्ड ब्वाय और वार्ड नर्स आ गईं। हरएक की नजर बाबाजी पर पड़ी और उनके शरीर पर आई चोटों पर पड़ीं। अब लड़कियों और लड़कों में बाबाजी को उठाने में होड़ मच गई। लड़के चाहते थे कि हम बाबाजी को उठा कर ऑपरेशन थियेटर में ले जाएं और लड़कियां भी इसी कोशिश में थीं। सबके मन में एक ही लालच था कि अपना भविष्य बाबाजी को हाथ दिखाकर जानें। फिर क्या था दोनों टीमें जुट गईं अपने-अपने काम में। लड़कियों ने पैर की ओर से पकड़ा और लड़कों ने हाथ पकड़ कर बाबाजी का जुलूस निकालना शुरू कर दिया। बेचार नारदजी को पैर में नरम हाथों की चुभन से गुदगुदी हो रही थी। वे बिन जल मछली की तरह तडफ़ड़ाए , बोले मैं इतना बीमार नहीं हू कि चार कदम चल न सकूं। मेरी विनय है कि दोनों ही ओर से छोड़ दो। वही खड़े सुपरिटेंडेंट ने दहाड़ कर कहा कि छोडऩा नही वरना बाबा हम सबको परेशान कर डालेगा। थाने में क्या हुआ ये थानेदार पहले ही बता चुके हैं। वो थानेदार इन दोनों पागलों को यहां पहुंचाने की सरकारी राशि भी ले गए हैं। यह सुनकर नारदजी बेहोश हो गए। नामालूम वही खड़ा होकर यह सब तमाशा देखता रहा। अब नारदजी को ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया उनके चोटों की जांच पड़ताल करके पट्टी बांध दी गई। डॉक्टरों ने कहा कि अभी तो दवाओं से काम चलेगा और बीमारी ठीक न हुई तो फिर आपरेशन करना होगा। यह सुनकर नामालूम भी बेहोश हो गया। अब दोनों को अगल-बगल लिटाया गया। दोनों साथियों को जब होश आया तो दोंनों यह देखकर चौंके कि नारदजी के जहां चोट थी वहां पट्टी नहीं बांधी गई। नई जगह पट्टियां बांधी गईं थी। काफी पूछताछ के बाद पता चला कि वार्ड ब्वाय और वार्ड नर्सों में झगड़ा होने के कारण दोनों ने बाबाजी को मेज,कुर्सियां,लोहे की जालियों से टकराते हुए ऑपरेशन थिएटर पहुंचाया। इसके बाद तो गजब जब हुआ पता चला कि बाबाजी का दाहिना हाथ ही नहीं उठ रहा है। नारदजी ने कहा कि यह तो ठीक है कि बायां हाथ ठीक वरना सुबह शौच के समय क्या करते। नामालूम बोला अरे बाबाजी आपका दाहिना हाथ काम नहीं कर रहा है और आप मस्ती ले रहे हो। सुपरिटेंडेंट का धैर्य जवाब दे गया और सुबह के चार बजते ही देखा कि बाबाजी न जाने क्या बड़बड़ा रहे हैं। उसकी समझ में नारायण के अलावा कुछ नहीं आया। उसने कहा कि नारायण अच्छा चपरासी था उसका हाल ही में देहांत हो गया। अब उसकी विधवा काम करती है उसे सुबह ही बुला दूंगा तब हाल चाल पूछ लेना। नारदजी बोले लगता है तक आप पागल हो गए हो। मेरा नारायण कभी नहीं मरता और महारानी लक्ष्मी सदैव सधवा रहतीं हैं। वह तो जगत का पालनहार है। नारदजी की बातें सुनकर सुपरिटेंडेंट बहुत खुश हुआ उसने सोचा कि मेरा काम बन गया। उसने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा कि बाबाजी अब देर न लगाओ। जल्दी से बताओ कि प्रमोशन कब होगा,ट्रांसफर कब होगा, नई बीबी कम मिलेगी। पुरानी वाली तो छोड़कर चली गई। बच्चे को भी साथ ले गई। अब आधी तनख्वाह हर महीने ले जाती है। बाबा ने कहा कि तुम्हारे हाथ में विवाह की सात लकीरें हैं । इसका मतलब तुम्हें सात बीवियां मिलेंगी। जब एक ने यह हाल कर रखा है तो बाकी की छह क्या करेंगी यह भी सोचा। और प्रमोशन और ट्रांसफर ? इसके बारे में मत पूछो। क्यों? क्योंकि प्रमोशन एक बार मिल सकता है और ट्रांसफर की नौबत ही नहीं आएगी। क्यों? क्योंकि सातवीं बीवी के मिलते ही तुम्हारा ट्रांसफर परमानेंट भगवान के घर हो जाएगा। सुपरिटेंंडेंट बोला कि मैं कंस की तरह बेवकूफ नहीं हूं कि देवकी को आठ संतानों के लिए जिंदा रखूं। मैं तो छह ही शादी करूंगा। सातवीं करूंगा ही नहीं तो फिर देखता हूं कि मौत कैसे आएगी। फिर नारद जी ने कहा आपकी लड़कों और लड़कियों की फौज ने मेरा क्या हाल बना रखा है? नई-नई जगह घायल कर दिया है और मेरा दाहिना हाथ बेकार कर दिया है। इसका उपचार कराइये। उन्होंने सुपरिटेंडेंंट को एक इशारा कर दिया कि अभी तुम्हारे हाथ में बहुत कुछ छिपा है वो हाथ ठीक होने के बाद ही बताऊंगा क्योंकि अभी अपने प्रभु की माला भी अशुद्ध बाएं हाथों से जपनी पड़ रही है वे भी नाराज हो रहे होंगे। अच्छा ठीक हैं अब तुम जाओ और मैं दो घंटे का मौन व्रत रखूंगा। किसी को मेरे पास आने नहीं देना।
इसके बाद नारदजी ने ध्यान लगाया और करीब आधे घंटे तक मौन रहे। इसके बाद फिर उन्होंने अपने साथी को चुपके से बुलाया। बड़ी गंभीरता से पूछा कि साथी, तुम इतने समय से मेरे साथ हो लेकिन दुर्भाग्य है कि मैंने तुम्हारा परिचय तक न पूछ पाया। नामालूम बोला, मौका मिला होता तब पूछते ना। कभी थाने तो कभी पागलखाने के हंगामे ने बुद्धि भ्रष्ट कर रखी है। न आप पूछ पाए और न ही मैं बता सका। चलो कोई बात नहीं देर आए दुरुस्त आए अब बताओ कि तुम्हारा असली नाम क्या है? जिससे मैं तुम्हें पुकारूं। तुम्हारे माता-पिता कौन हैं? जिनका मैं धन्यवाद कर सकूं। तुम्हारा निवास स्थान कहां है? जिसके मैं दर्शन कर सकूं। यह सुनते ही नामालूम फफक कर रो पड़ा। नारदजी ने कारण पूछा तो वह बता न सका। थोड़ी देर बाद जब वह संयत स्थिति में आया तो उसने बताया कि मेरा असली नाम मनहूस है। वह क्यों? क्योंकि मेरे जन्म के साथ ही मेरे माता-पिता का देहांत हो गया था। मैं करीब छह-सात महीने का ही रहा हूंगा। मेरे माता-पिता का स्वर्गवास हो गया था। इसके बाद मुझे कई लोगों ने पालने की कोशिश की जिसके यहां जाता कुछ न कुछ अप्रिय घटित हो जाता लोग मुझे छोड़ देते,फिर किसी को दया आती वह पालता फिर उसके साथ अशुभ घटना होती तो वह मुझे लावारिस छोड़ देता। इस तरह से जब तीन वर्ष के आसपास की आयु हुई होगी। तब से मैं लावारिस हूं। आसपास के लोग मुझे मनहूस कह कर पुकारते थे। इसके बाद इधर-उधर के धक्के खाता फिर रहा हूं। मुझे नहीं पता कि मेरा नाम क्या है,मेरे माता-पिता कौन हैं, कौन सा मेरा घर है? यह कह कर फिर रोने लगा। नारद जी ने शांत करते हुए कहा कि तुम धैर्य रखो सब कुछ ठीक हो जाएगा। उसने कहा कि खाक ठीक हो जाएगा। मैं ने अभी तक सारे गलत काम किए हैं लोगों को सताया-रुलाया है। लोगों के दिल दुखाए हैं,चोरी जारी करके अपना पेट भरा है। मुझे इन सबका कोई ज्ञान ही नहीं था, फिर कोई राह दिखाने वाला भी नहीं था।  एक बार मैं एक मंदिर में सो गया था तो वहां एक बाबा कुछ लोगों को बता रहे थे, जब भी किसी से जाने-अनजाने में गलती या दुष्कर्म हो जाए तो उसे मौका मिलते ही पश्चाताप कर लेना चाहिए। भगवान सबकुछ भूल कर उसे माफ कर देते हैं और रास्ता भी बताते हैं। मेरे मन में यह बात काफी दिनों से गूंज रही थी। इतने में आप गिरे तो मैं भी लोगों के साथ देखने गया सब लोग तो चले गए लेकिन मैं यह सोच कर आपके साथ हो लिया हो न हो यही मेरे लिए पश्चाताप का समय है। तब से मैं आपके साथ हूं लेकिन मेरी मनहूसित तो देखिये कि आप भी नित नई नई मुसीबतो में फंसते जा रहे हैं। यकीन मानिये आप मेरी वजह से ही पागलखाने में है। फिर रोने लगा। इतने में पागलखाने का सुपरिटेंडेंट आ गया। अभिवादन करते हुए नामालूम को डांटने लगा कि तुम कैसे यहां आए? मैंने सबको दो घंटे के लिए मना किया था। नारदजी बीच में ही बोल पड़े , इसे मैंने ही बुलाया था श्रीमानजी। देखिये समय दो घंटे से दस मिनट ऊपर हो गया है।  क्रमश:

Sunday, 17 April 2016

व्यंग्य पुराण-जब थाना बना कुरुक्षेत्र का मैदान

पुराने जमाने में नारद जी पृथ्वी लोक का भ्रमण करने आए तो उन्होंने अपना जरूरी-जरूरी काम निपटाया और वापस अपने वतन को लौट गए। वहां जाकर विष्णु भगवान से बोले कि आपने हमें कहां भेज दिया। वहां तो हमारा एक पल के लिए भी मन नहीं लगा,मैं तो अपना काम निपटा कर तत्काल आपके दर्शन के लिए चला आया। कंठी माला पटक कर बोले भूखे भजन न होहिं गोपाला, यह लो अपना कंठी माला। भगवन ने पूछा कि क्या हुआ, खाना-पीना नहीं मिला। गुस्से में बोले, हां मिला, घी चुपड़ी रोटी,छौंकी हुई अरहर की दाल,आलू का चोखा और चावल और कुछ नहीं। और क्या चाहिए था,नारद जी। स्वर्ग जैसा सोमरस का पान व अप्सराओं की जगह भोले बाबा की भांग और तम्बाकू,अप्सराओं की जगह लम्बे-लम्बे घूंघट वाली महिलाएं।अब बताओ कि हम किस तरह से वहां अपना मन लगाते। विष्णु भगवान ने चेताया कि एक बार तुम मोहिनी के चक्कर में बंदर बन चुके हो अब क्या फिर ? इस पर नारद जी तमतमा उठे,भगवन पिछली बार आपने धोखा दिया था। इस बार ऐसा नहीं चलेगा। इस बार आप बंदर नहीं कुछ भी बना दोगे तो हम आपका शाप नहीं बल्कि वरदान देंगे। अब जमाना बदल गया है। ऐसा क्या हुआ नारद जी। भगवन,मैं आपसे झूठ नहीं बोलता। मैं आपसे छिप-छिप कर पृथ्वी लोक को देखा करता हूं। आजकल तो पृथ्वी लोक बहुत ही अच्छा लगने लगा है। अच्छा नारद जी, अब मैं समझा कि चौबीस घंटे नारायण-नारायण भजने वाला नारद अब चौबीस घंटे में एक बार भी नारायण क्यों नहीं बोल रहा है। अच्छा नारद जी लगता है कि स्वर्ग लोग से आपका मोह भंग हो गया है। नहीं-नहीं,भगवन-ऐसा कतई नहीं है लेकिन क्या करूं रोज-रोज एक ही खाना खाने से मन ऊब जाता है, तो यह मन भी भटक जाता है। क्या चाहते हो नारद जी, थोड़े दिनों के लिए पृथ्वी लोक जाना चाहता हूं । भगवन ने चेताया कि देख लो नारद जी, हमारे यहां कर्म आधारित व्यवस्था है, हमारी कसौटी पर खरे उतरोगे तो तभी स्वर्ग में वापस आ पाओगे। आप पृथ्वी लोक जाना चाहते हो तो जाओ मुझे कोई आपत्ति नहीं है। काफी सोच विचार कर नारद जी बोले-ठीक है, भगवन। मुझे सारा कुछ मालूम है,हम ध्यान रखेंगे। इसके बाद नारद जी ने वहां से प्रस्थान किया। जैसे ही स्वर्ग का दरवाजा पार किया,धड़ाम से धरती में औंधे आ पड़े। बोले-नारायण-नारायण। किसी व्यक्ति को गिरा देख आस-पास के लोग दौड़े और जब उन्होंनें देखा कि एक बाबा पड़ा कराह रहा है और नारायण-नारायण बुला रहा है। सभी व्यक्ति बोले ये तो नंगा बाबा है, इसके पास तो धेला नहीं है, इसकी क्या मदद करनी है। उनमें से एक बोला कि बाबा नारायण-नारायण बुला रहा है। आपमें से जो भी नारायण हो आ जाओ। लगता है कि नारायण बाबा का कोई रिश्तेदार है। कोई नारायण तो सामने नहीं आया लेकिन एक धर्मालु प्रवृत्ति का व्यक्ति था वह अवश्य आगे आया और नारद जी के हाल-चाल पूछे और यह पूछा कि यह चोट कैसे लगी। चलिए आपको अस्पताल लेकर चलते हैं। यह सुनकर नारद जी चौंके कि मुझसे तो उठा नहीं जा रहा है और ये मुझे अस्पताल ले जाने की बात कह रहा है। नारद जी ने कहा कि मैं नारद हूं नारद। हमारे जमाने में लक्ष्मण को शक्ति लगी थी तो लक्ष्मण नहीं गए सुषेन वैद्य के पास, सुषेन वैद्य आए थे लक्ष्मण जी के पास। वह व्यक्ति बोला बाबा ये उस जमाने की बात आज के जमाने में अस्पताल ही हैं। चलना तो चलिए नहीं तो हम भी अन्य लोगों की तरह अपने घर को जावें। नारद जी बोले-नहीं नहीं भाई। चलिये चलते हैं। काफी मशक्कत के बाद नारद जी सरकारी अस्पताल पहुंच गए। वहां देखा तो चारों ओर चीख-पुकार मची हुई। कोहराम मचा हुआ है। लोग लम्बी-लम्बी लाइन में लगे हुए हैं। काफी समय बाद नारद जी का नम्बर आया तो अस्पताल का डॉक्टर ने उस व्यक्ति से पूछा जो नारद जी को घायलावस्था में लेकर आया था। यह चोट कैसे लगी,कोई एक्सीडेंट मालूम होता है। इसकी पुलिस में रिपोर्ट लिखाई। इसके बिना इलाज शुरू नहीं हो सकेगा। अब नारद जी चक्कर में पड़ गए कि डाक्टर ने मानवता छोड़कर पहले पुलिस में रिपोर्ट लिखाने का बात कर रहा है। इस पर तीमारदार बोला कि चलो नारद जी थाने, पर क्यों वहां तो चोर-जुआरी,बदमाश और अपराधी जाते हैं । हमने कौन सा जुर्म किया है कि जो हमें वहां ले जा रहे हो। वह बोला तुम इस दुनिया में नए-नए आए हो सब कुछ जान जाओगे। यहां से उठकर चलो। नारदजी उसके पीछे-पीछे चल दिए। वहां पहुंचे तो देखा कि वहां तो बड़े-बड़े अपराधी। पुलिस वालों के साथ बड़े आराम से बातें कर रहे हैं। बातें हीं नहीं कर रहे हैं खान-पान,धूम्रपान,सोमपान में व्यस्त हैं। कुछ लोग तो थोड़ी-थोड़ी देर तक की सैर-सपाटा करके सीट पर बैठ जाते थे। नारद जी का साथी किसी पुलिस वाले से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, तो नारद जी ने सोचा कि चलो मैं स्वयं अपनी पैरवी करूं और अपना इलाज तो करवाऊं । यह सोच कर वह जिस पुलिस वाले के पास जाते वह कह देता बाबा-छुट्टे नहीं हैं कल आना या नौ हों तो दस का ले जाओ। कुछ को दया आ गई तो उसने हाथ में पाच-दस का नोट जो आया दे दिया। जब नारद जी कुछ कहने को हुए तो उसन डांटते हुए कहा अब क्या है दे दिया है जाओ अगला दरवाजा खटखटाओ। बहुत लालची लगते हो। अब नारदजी हैरान-परेशान। कहने लगे ये क्या बला है। इन रक्षकों को यह भी तमीज नहीं है कि किस तरह से बात की जाए। साथी व्यक्ति ने कहा कि महाराज ये पुलिस वाले तो आपसे बहुत तमीज से बात करते हैं वरना इनकी भाषा सुनकर इंसान तो क्या जानवर भी भाग जाते हैं। फिर उसने कहा कि आप मेरे साथ चलो। फिर वह चला तो पुलिस वाले के पास बहुत हिम्मत करके पहुंचा। देखते ही बोला बाबा मेरे पीछे क्यों पड़े हो दे दिए। साथी ने का कि ये बाबा मांगने नहीं आए हैं तो क्या करने आए हैं-पुलिस वाला बोला। नारद जी के साथी ने कहा कि इनके चोट लगी है अस्पताल लेकर गया था तो उन्होंने कहा कि पहले पुलिस में रिपोर्ट लिखाओ तब इलाज होगा। इसलिए मैं यहां आया था। पहले तू कहां मर गया था, जो अब आया है बड़ा भारी बाबा का वकील बनके। चलो आओ। बाबा की जेब में कुछ है या तुम्हारी जेब में कुछ है, कि खाली बाबा की रिपोर्ट लिखाओगे। उसने नारद जी की ओर इशारा किया तो उन्होंने जो पुलिस वालों से पैसे मिले थे सारे-के सारे दे दिए। इस पर पुलिस वाला चिल्लाया। इनसे क्या होगा। क्या मैं बाबा की तरह भिखारी हूं। मेरी भी कोई हैसियत है। हैसियत देखकर बात करो वरना भागो यहां से नहीं तो किसी गंभीर दफा में बंद कर दूंगा। इस पर साथी बोला कि मैं तो मदद करने आया था। आप चाहें तो बाबा की मदद करके इनकी रिपोर्ट लिख लो या चाहे जो कुछ करो मैं तो चला। यह सुनते ही पुलिस वाले ने साथी को पकड़ कर बिठा लिया जाते कहां हो।चलो मैं तुम्हारी और बाबा की मदद करता हूं। रिपोर्ट लिखानी है तो पहले नाम बताओ। वह बोला कि चोट तो बाबा को लगी है उनका नाम उन्हीं से पूछो हमें नहीं मालूम। इसपर वह नारद जी की ओर मुखातिब हुआ और पूछा कि आपका नाम क्या है? नारद, ब्रह्मर्षि नारद, पिता का नाम ब्रह्माजी, निवास स्वर्गलोक। फिर उसने साथी से पूछा कि तुम्हारी गवाही लगेगी कि तुम्ही थाने तक लाए थे इसलिए अपना नाम बताओ? चंद मिनट सोच कर बोला-मेरा नाम नामालूम, पिता का नाम पता नहीं और निवास अज्ञात स्थान तो जनपद ढूंढते रह जाओगे। किस राज्य से हो इस पर वह फंस गया,मौन हो गया। तभी पुलिस वाले की तंद्रा टूटी। फिर उसने दोनों के नामों को गौर से पढ़ा। हमें तुम दोनों पागल लगते हो। तुम्हें अस्पताल नहीं पागलखाने भेजने की जरूरत है। इस पर नारद जी से भागो कह कर वह भागा। तभी पुलिस वाले ने शोर मचा दिया। पकड़ो-पकड़ो। पागल हैं, पागलखाने ले जाना है। बहुत खतरनाक पागल है। फिर क्या था, मच गई भगदड़। कोई कहीं गिरा-कोई कहीं पड़ा। थोड़ी देर में थाना कुरुक्षेत्र का मैदान बन गया। हर कोई एक दूसरे उलझ रहा था। तभी थानेदार भगवान कृष्ण की भूमिका में हाथ में सुदर्शन चक्र की जगह पर अपनी सरकारी पिस्तौल से एक हवाई फायर किया। फिर जो जहां था थम कर रह गया। और बाबा नारद और उनके साथी को पकड़ लिया गया। मामला पूछा तो कहा कि ये दोनों पागल हैं और पागलखाने ले जाना है। बड़े अधिकारी से राहत पाने की उम्मीद में बाबा के साथी ने उनसे गुहार की कि हम पागल नहीं हैं हम तो बाबा की मदद करने आए थे। थानेदार ने कहा कि तुम झूठ बोलते हो। इस पर पुलिसवाले को बुलाया उसने दोनों नाम पते दिखाते हुए कहा कि ये बाबा खुद को नारद कहता है पिता का नाम ब्रह्मा बताता है निवासी स्वर्गलोग बताता है, बीच में नारद जी ने बोलने का प्रयास किया तो थानेदार ने डांटते हुए कहा-तुम चुप रहो। कागज देखने के बाद एक पिंजड़ानुमा गाड़ी पागलखाने से मंगाई गई और उसमें कैद करके नारद जी और उनके साथी को पागलखाने ले जाया गया।
क्रमश:

Sunday, 6 September 2015

जे.पी. द्विवेदी की दो कविताएं

छलका दर्द 
कहीं मान मिला,अपमान मिला
सब  कुछ  सहते चले गए  ।
सम्मान की भूख बदस्तूर है ,
सिस्टम से  लड़ते चले गए ।

हर कोई रूठा , छूटा पीछे
भूखा  था जो  पैसों  का ।
जख्म का मरहम पाने को
हम  दूर  होते  चले गए ।

मन की ख्वाहिश दफन हुई
कर्ज का बोझ बढ़ा इतना ।
फजऱ् पड़े हैं जस के  तस ,
हम अपनो से ही छले गए ।

साँसो का हक किसको दूँ मैं ,
किसे बताऊँ किसका हूँ मैं ।
अपने ही बिछाये जालों मे
खुद ही फँसते चले गए ।

कौन  है अपना  कौन पराया
सब  पे  है  माया का साया ।
किस.किस दलदल की बात करूँ
पत्थर  मे  धंसते  चले  गए ।

श्याह  अंधेरा हर  कोने मे
कहाँ  दर्द है  अब  रोने मे ।
रीते  दिल  चाह है  रीति,
सब हँस कर देखो चले गए ।

अपनी समझ बताऊँ किसको ,
अपना दर्द सुनाऊँ  किसको।
मुझसे ज्यादा दुखी सभी हैं
यह  कहते सारे चले गए ।

शब्द हुए गुमनाम हैं जब से ए
नज़्म  बनी  बेनाम  हैं तबसे ।
जब से गमों मे गुमसुम हूँ मैं ए
गूंगे  भी  बककर  चले गए ।

दरकता समाज
सम्बोधन संबंधहीन सब
सार्थकता से दूर हो चले ।
गरिमामय जब रहा न कुछ भी
गर्वित पुंज कहाँ से लाऊँ ॥
संस्कार सब लुप्त हो रहे
नैतिकता का घोर अकाल।
अपने ही अपनों के दुश्मन
किसे अपनत्व का पाठ सिखाऊँ
कहाँ लुप्त है सहनशीलता
भरी कलह से हर दीवार ।
लुकाछिपी सा त्रासित जीवन
फिर भी नित्य निकेतन जाऊँ ।
संवादहीन चुपचाप अकिंचन
अवचेतन मन शून्य झाँकता ।
गहन अंधेरा मन मंदिर मे
कैसे ज्ञान की ज्योति जलाऊँ ॥
आतुरता को नहीं प्रतीक्षा
दरकिनार कर सबकी इच्छा ।
किस वजूद की यह मंत्रणा
नया कौन सा गीत सुनाऊँ ॥
देव पूज्य थी धरा हमारी
पढ़ते आए , सुनते आए ।
धूलदृधूसरित शिला पट्ट अब
नया कौन अभिलेख सजाऊँ ॥

भगवान श्रीकृष्ण का असली चरित्र क्या है?

योगिराज श्रीकृष्ण के चरित्र से खेलते माखनचोर और रासलीला रचैया बताने वाले


ओ3म। श्रीकृष्ण का नाम आते ही लोगों के जेहन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का खुशियों भरा पर्व आ जाता है,क्योंकि उस समय चहुंओर संकट और सबलों के अत्याचार से त्राहिमाम करते लोगों को किसी महान आत्मा की आवश्यकता थी और वह महान आत्मा के रूप में श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। उस समय विश्व के एकमात्र पूर्ण ज्ञानी,विवेकी,तपस्वी,योगिराज,कर्मयोगी थे श्रीकृष्ण। महाभारत और उससे पूर्व के ग्रंथों में मर्यादापूर्ण पुरुषोत्तम के रूप में श्रीकृष्ण को जाना जाता था। उसके बाद भागवत सहित अन्य नौ ग्रंथों में श्रीकृष्ण के चरित्रहनन की बाल लीलाएं,रास लीलाएंं, चीरहरण आदि की कवियों की कपोल कल्पित कहानियों ने सम्पूर्ण इतिहास का ही नाश कर दिया।
युगपुरुष महायोगी श्रीकृष्ण को एक माखनचोर,व्यभिचारी,विश्वासघाती,अवसरवादी सहित अनेक लांछनों से कलंकित कर दिया। ये सारी बातें आज हल्के-फुल्के मनोरंजन के साधन एवं धर्म की आड़ में व्यवसाय करने वालों ने अल्पशिक्षित व अशिक्षितों के बीच ऐसी फैला दीं कि मानों यही सत्य धर्म है। इन सबकी विवेचनाएं करने के लिए हम आगे बढ़ते हैं।
कहते हैं कि बचपन में श्रीकृष्ण घर-घर जाकर माखन चुराया करते थे और गोपिकाओं को परेशान किया करते थे। नन्द शब्द किसी का नाम नहीं है बल्कि यह सम्मानित शब्द उस व्यक्ति के नाम के आगे लगाया जाता है जिसके पास एक लाख गायें हों। अब सवाल उठता है कि जिसके घर में एक लाख गायें हों और दूध-दही  व माखन की नदियां बह रहीं हों वो क्यों दूसरे के घर माखन चुराकर बाललीला करेंगा। क्या बाल लीला करने के लिए सिर्फ यही एक कार्य बचा था। आतताई कंस को मारने के लिए श्रीकृष्ण ने जिस तरह से तपस्या कर योग साधना की थी उसका जिक्र कहीं नहीं मिलता। कंस जैसा बलशाली और मल्लयुद्ध का बहुत बड़ा योद्धा था। यह तो सभी जानते हैं । मेरा मानना है कि उस समय कंस के मन भी यही होगा कि यह छोकरा मुझे क्या मार सकेगा। लेकिन उसे क्या मालूम कि योग साधना से श्रीकृष्ण ने बल के साथ मस्तिष्क का विकास कंस से अधिक कर लिया था और उसी बल से कंस का वध कर सके।सबसे पहले राधा का वर्णन आता है। महाभारत काल में किसी भी ऐसी राधा का जिक्र नहीं है । एक राधा अवश्य ही महाभारत में आई, वह कर्ण का पालन करने वाली अधिरथ की पत्नी थी।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युथानं धर्मस्य तदात्मानंसृजाम्यहम।।
श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि जब-जब धर्म का लोप होता है तब-तब मैं शरीर धारण करता हूं। इस परिप्रेक्ष्य में महर्षि दयानंद रचित सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में कहा गया है कि वेद विरुद्ध होने से यह प्रमाण नहीं है और ऐसा हो सकता है कि श्रीकृष्ण धर्मात्मा और धर्म की रक्षा करना चाहते थे कि मैं युग-युग में जन्म लेकर श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों का नाश करूं, तो इसमें कुछ भी दोष नहीं है क्योंकि 'परोपकाराय सतां विभूतय: परोपकार के लिए सत्पुरुषों का तन-मन-धन होता है तथापि श्रीकृष्ण को इस बात को लेकर ईश्वर नहीं माना जा सकता। एक अन्य प्रश्न कि संसार में 24 अवतार हुए हैं और इनको अवतार क्यों माना जाता है। सत्यार्थ प्रकाश में स्पष्ट है कि वेदार्थ न जानने वाले संप्रदायी लोगों के बहकाने और अपने आप अविद्वान होने से भ्रमजाल में फंस के ऐसी ऐसी अप्रमाणिक बातें करते हैं और मानते हैं। इस पर एक प्रश्न यह कि ईश्वर अवतार न लेवे तो कंस-रावणादि दुष्टों का नाश कैसे हो? के जवाब मे सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि जो ईश्वर अवतार या शरीर धारण किए बिना ही जगत की उत्पत्ति,स्थिति, प्रलय करता है। उसके सामने कंस और रावणादि कीट के समान भी नहीं हैं। वह सर्वव्यापक होने से कंस और रावणादि के शरीर में भी परिपूर्ण हो रहा है। जब चाहे उसी समय मर्मच्छेदन करके नाश कर सकता है। भला इस अनन्तगुण वाले परमात्मा को एक छुद्र जीव को मारने के लिए जन्ममरण युक्त शरीर को धारण करने की क्या आवश्यका। इसलिए ईश्वर इस सृष्टि में 'न भूतो न भविष्यति है।
खण्ड-खण्ड भारत को महाभारत बनाने को
महाभारत का युद्ध क्यों जरूरी था और श्री कृष्ण क्यों ऐसा चाहते थे। इस पर विचार करने के लिए एक वृत्तांत पर नजर डालते हैं। स्वामी समर्पणानंद सरस्वती द्वारा रचित श्रीमदभागवत गीता,समर्पण भाष्य में स्पष्ट लिखा है कि कंस वध के बाद प्रजा ने श्रीकृष्ण से आग्रह किया कि आपने हमें कंस के अत्याचारों से मुक्त कराया है। अत: आप ही इस राज्य को संभालों। इस पर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि राज्य तो नानाजी संभालेंगे और हम खोया हुआ राज्य वापस लेने के लिए जा रहे हैं। उस समय श्रीकृष्ण ने निश्चय किया कि आज महाभारत खण्ड-खण्ड है। महाभारत तो एक ओर भारत के सैकड़ों छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया है। मैं खण्ड-खण्ड भारत को भारत और भारत को महाभारत फिर से बनाकर रहूंगा। धरत पर धर्म का एकछत्र राज्य होगा और राजा धार्मिक होगा और प्रजा भी धर्मात्मा होगी।
विवाह के तत्काल बाद ब्रह्मचर्य व्रत
महायोगी, योगिराज श्रीकृष्ण ने मथुरा से निकलकर उज्जयिनी में सांदीपनि ऋषि के आश्रम में पहले विद्या का राज्य प्राप्त किया और साथ ही चरित्र का राज्य प्राप्त किया। बह्मचर्य की समाप्ति पर वीरोचित मार्ग से रुक्मिणी से विवाह किया किन्तु उत्तम संतान की अभिलाषा से पति-पत्नी दोनों ब्रह्मचर्य का व्रत लिया। प्रात:काल ही हिमालय की ओर चल पड़े। जिस स्थान पर आज बदरीनाथ धाम है, वहां 12 वर्ष तक घोर ब्रह्मचर्य का पालन किया। बारहवें वर्ष केवल बेर खाकर जीवन बिताया। इसलिय कृष्ण बदरी नाथ और इस स्थान का नाम बदरीनाथ धाम पड़ा।
राधा कौन थी?
स्वामी समर्पणानंद सरस्वती द्वारा रचित श्रीमदभागवत गीता,समर्पण भाष्य में स्पष्ट लिखा है कि कंस भारत में गोहत्या का आदि प्रवर्तक था। ससुराल में नरबलि होती थी। जरासंध ने 100 राजाओं का सिर काट कर शिवजी पर चढ़ाने का संकल्प लिया था और 86 राजा इकट्ठा भी कर लिए थे। उसे क्या पता था कि क्षत्रिय शिरोमणि श्रीकृष्ण बड़ी आसानी से मरवा देंगे। कंस के मंत्री कहते है कि हे राजन देव यज्ञों के सहारे जीते हैं और यज्ञ गो-ब्राह्मण के सहारे। इसलिए सब उपायों से सत्यवादी ब्राह्मणों और गायों इन दोंनो को मारें। गो हत्या का सबसे अधिक प्रभाव निश्चित रूप से गोपालों पर पड़ा। इनमें से एक गोपाल रायणा बहुत ही बुद्धिमान था। उसने विद्रोह का बीज बोया था। राधा नाम की गुप्त मंडली बनी। जो प्रत्यक्ष में नाच-गाकर प्रभु आराधना करती थी परन्तु वास्तव में वह कंस के विरुद्ध विद्रोह की तैयारी करती थी। बालक श्रीकृष्ण भी इस मण्डली में आते जाते थे। रायणा बालक श्रीकृष्ण के मामा थे, वे मा यशोदा के रिश्ते में भाई होते थे। यद्यपि कृष्ण की आयु छोटी थी लेकिन विलक्षण प्रतिभा देखकर रायणा ने मरते समय इस राधिका मण्डली का नेतृत्व श्रीकृष्ण को सौंप दिया । इसी मण्डली के चलते ही श्रीकृष्ण ने अपने मामा कंस का वध कर दिया। इस घटना को लेकर ब्रह्मवैवर्त  पुराण में राधाकृष्ण नाम से श्रीकृष्ण के चरित्र का हनन किया गया उसे बताते ही लाज आती है। दुखद स्थिति यह है आज इसी को धर्म माना जा रहा है।
कैसे कलंकित किया गया
वेदों के अनुसार उस व्यक्ति के नाम के पूर्व 108 जैसे सम्माननीय शब्द को जोड़ा जाता है, जिसने पहले 24 वर्ष,फिर उसके बाद 36 वर्ष और तत्पश्चात 48 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का पालन किया हो। श्रीकृष्ण की आयु विवाह के समय 36 वर्ष बताई जाती है। उत्तम संतान की कामना से उन्होंने 12 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया। इस प्रकार वह 108 योगिराज कहलाए। ऐसे महापुरुष को दस वर्ष की आयु में चीरहरण करने वाला और 16 हजार 108 गोपिकाओं के संग रास रचाने वाला बताकर इतिहास को कलंकित कर डाला। इस पर देश ही नहंीं बल्कि विदेशियों ने भी उंगली उठाई। हमें आज यह सब वर्णन करते शर्म आती है कि चंद लोगों ने अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए महामानव योगीराज श्रीकृष्ण को कहां से कहां गिरा दिया। जहां तक श्रीकृष्ण के प्रेम का जिक्र तो सुदामा उद्धार, विदुर के घर भोजन, द्रोपदी की मदद जैसी घटनाएं अवश्य ही महाभारत में आईं हैं।
सामान्यतया कृष्ण चरित्र का उल्लेख ब्रह्म,पदम,विष्णु,वायु,भागवत, ब्रह्मवैवर्त,स्कन्द,वामन और कूर्म इन 7 पुराणों में मिलता है। जैसा विस्तार ब्रह्म,विष्णु,भागवत और ब्रह्मवैवर्त में है उतना अन्य पुराणों में नहीं है। इस पौराणिक वर्णन में न तो महाभारत के कृष्ण की राजनैतिक विलक्षणता का ही उल्लेख हुआ है और न उसकी चारित्रिक महत्ता,ओजस्विता और उदात्तता का। पुराणकार की दृष्टि में कृष्ण की वात्सल्य और श्रंगार लीलाओं के चित्रण की ओर ही विशेष रूप से उन्मुख हुए हैं। जब कृष्ण को ईश्वर मानकर उसके दिव्य अवतार की उपासना देश में प्रचलित हुई तो कृष्णोपासना के आधार पर अनेक सम्प्रदाय स्थापित हो गए। पांचरात्र, भागवत,वासुदेव,माध्व,निम्बार्क,वल्लभ सम्प्रदाय प्रमुख थे। इन सम्प्रदायों के जन्म से पूर्व तक कृष्ण आदर्श चरित्रवान परम सात्विक आचार सम्पन्न और प्रतिभाशाली महापुरुष समझे जाते थे। परन्तु तांत्रिक साधना के प्रचार के कारण वैष्णव सम्प्रदायों मं भी वासनामूलक श्रंगार का मिश्रण होने लगा। महाभारत के कृष्ण जहां मर्यादापोषक, संयमी और सत्वगुण सम्पन्न हैं। वहां पुराणों,काव्यग्रंथों एवं अन्य साम्प्रदायिक गंन्थ में उनके जीवन को अत्यन्त विलासितापूर्ण, स्थूल वासनायुक्त और रोमांटिक बनाने का प्रयत्न किया गया।
श्रीमदभागवत के रासपंचाध्यायी दशम स्कन्द के 19-33 अध्याय में गोपी प्रसंग और कुब्जा लीला का जिस तरह का भोंडा प्रदर्शन किया गया है उसका वर्णन करने में लाज आती है। इसी प्रकार इसी स्कन्द के अ.90 श्लोक 29 तथा 31 में श्रीकृष्ण की 16108 पत्नियां और प्रत्येक के दस-दस पुत्र उत्पन्न बता कर इस महात्मा के चरित्र को कलंकित किया गया है।
इस का जिक्र करता यह श्लोक
आस्थितस्य परधर्म कृष्णस्य गृहमेधिनाम।
आसनसषोडस साहस्रं महिष्योष्ट शताधिकम।।
एकैकस्या दशदश कृष्णोअजीजनदात्मजान।
यावंत्य आत्मनो भार्या अमोघ रति ईश्वर:।।
राधा-कृष्ण की लीला का वर्णन भी भागवत में कहीं भी नहीं है। भागवत को वैष्णव लोग पंचम वेद कहते हैं। उसमें राधा का उल्लेख न होना एक विचित्र घटना है। इसी भांति विष्णु और हरिवंश पुराण मं राधा का संकेत मात्र से भी नाम नहीं आता है। श्रीकृष्ण की इस तथाकथित प्रेयसी राधा का महाभारत में भी कहीं पता नहीं है। केवल ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा का जिक्र होता है। उसमें कृष्ण के बारे में जो कलंकित चित्रण किया गया है, उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। विभिन्न मत-मतांतरों के लोगों ने अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए कृष्णवतार को ही कलंकित कर डाला। इन तथाकथित दुराचारी गुरुओं ने धर्म और ईश्वर की आड़ में ऐसे ग्रंथ रचकर पूर्ण मानवता को ही कलंकित कर डाला है। ईश्वर इन सभी को सद्बुद्धि प्रदान करे।
पं.महेन्द्र कुमार आर्य
पूर्व प्रधान, आर्य समाज सूरजपुर

परिचर्चा: 'ईश्वर और 'भगवान में क्या है अंतर?

ग्रेटर नोएडा (ब्यूरो)। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व होने के कारण शहर में भक्ति रस की धारा का प्रवाह हो रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न सामने आया कि सृष्टि रचयिता ईश्वर और आराध्य देव भगवान में क्या अंतर है।इस पर चंद हस्तियों के विचार इस प्रकार हैं:-
एकदूसरे के पर्यायवाची हैं: विद्यासागर वर्मा 
पूर्व राजदूत विद्यासागर वर्मा कहते हैं कि ईश्वर और भगवान एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। ऐश्वर्यवान व्यक्ति को भगवान कहा दिया जाता है जैसे भगवान बुद्ध,भगवान महावीर आदि।
अनेक नाम ईश्वर एक है: बिजेन्द्र आर्य
आर्य नेता बिजेन्द्र आर्य ने कहा कि ईश्वर और भगवान एक ही है। जिस तरह से बच्चे को बचपन में अनेक नाम से पुकारा जाता है उसी तरह से हम ईश्वर को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।

ईश्वर निराकार है,भगवान साकार है:गोस्वामी
ग्रेटर नोएडा के प्रखर संत गोस्वामी सुशील जी महाराज ने कहा कि ईश्वर और भगवान दोनो ही अलग-अलग हैं। भगवान तो कोई भी मनुष्य भी सत्कर्म करके  बन सकता है। लेकिन ईश्वर निराकार है वह शरीर धारण नहीं करता है। उन्होंने कहा कि सत्कर्म करके ही राम,कृष्ण,महावीर और बुद्ध भगवान बन गए।
गुण-कर्म के आधार पर भगवान होते हैं:एडवोकेट राजकुमार नागररामलीला समिति के संरक्षक और वरिष्ठ एडवोकेट राजकुमार नागर भी कहते हेैं कि ईश्वर और भगवान एक ही है। गुण और कर्म के आधार पर भगवान माना जाता है।
ईश्वर सर्वगुण सम्पन्न होता है:पं. मूलचंद आर्य
आर्य समाज सूरजपुर के वरिष्ठ उप प्रधान पं. मूलचंद आर्य ने कहा कि ऐश्वर्ययुक्त
सभी गुणों से संपन्न परमात्मा को ईश्वर कहते हैं। सच्चिदानंद और परमेश्वर के नाम से उसे जाना जा सकता है। गुण कर्म और स्वभाव के कारण महामानव यहां भगवान बन गए और लोंगों ने उनकी आराधना की जबकि ये भगवान स्वयं किसी न किसी आराध्य की आराधना करते हैं। हमें भी उन्ही देवों की आराधना करनी चाहिए, यही आर्य समाज कहता है।
ईश्वर को ज्ञान से प्राप्त किया जा सकता है:तेजपाल सिंह नागर
प्राचार्य एवं नेता तेज पाल सिंह नागर कहते हैं कि ईश्वर को ज्ञान से और भगवान को भक्ति से पाया जा सकता है। ईश्वर तटस्थ होता है, जबकि भगवान अपने भक्त के अधीन होता है और वह पक्षपात भी कर सकता है।
ईश्वर सर्वव्यापक है: पं. धर्मवीर आर्य
आर्य समाज सूरजपुर के मंत्री पं. धर्मवीर आर्य का कहना है कि ईश्वर एक है और निराकार है सर्वव्यापक है। ईश्वर सम्पूर्ण 22 गुणों से युक्त होता है जबकि भगवान पुरुषोत्तम एवं छह गुणों वाला होता है। राम,कृष्ण आदि ऐसे ही भगवान है।
दोनों में अंतर है:एडवोकेट मुकेश शर्मा

वरिष्ठ समाजसेवी और एडवोकेट मुकेश कुमार शर्मा का कहना है कि ईश्वर और भगवान में अंतर जरूर है। ईश्वर एक है जबकि भगवान अनेक हैं। ये भगवान भी इसी ईश्वर की आराधना करते हैं।