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Monday, 2 January 2017

आयकर छूट की सीमा कितनी हो

मात्र 29 दिनों के बाद देश का आम बजट पेश होने जा रहा है। इस बजट में रेलबजट भी शामिल होगा। मौजूदा वक्त मेंं नोटबंदी के निर्णय के बाद सबसे अधिक आयकर अदा करने वाले या अदा न कर पाने वाले करदाता स्वयं मानसिक रूप से प्रताडि़त महसूस कर रहे हैं। उनके सामने सरकार के रौद्र रूप का भय सता रहा है। हालांकि सारी तिकड़में लगाने की सोचने वाले भी यह एक बार यह भी विचार कर रहे हैं कि हाईटेक्नीक से लैस सरकार के चंगुल में फंसने के बाद बड़ा घाटा होगा। इसलिए वे कर देने का मन भी बना रहे हैं लेकिन कर की दरें ऊंची और आयकर छूट की सीमा बहुत कम होने के कारण वे हिचकिचा भी रहे हैं। आज के समय में सरकार ने मात्र ढाई लाख रुपये की आय को कर से मुक्त रखा है। आज के उपभोक्ता सूचकांक और जमीनी स्तर की महंगाई देखते हुए यह आंकड़ा बहुत ही छोटा है। तीन लाख रुपये की आमदनी वाला साल में पांच हजार रुपये आयकर देने की स्थिति में नहीं है उसके लिए पांच हजार रुपये बहुत कीमती होते हैं। इसी तरह के विचारों को देखते हुए बुद्धिजीवियों ने आयकर छूट की सीमा को ढाई लाख से बढ़ा कर पांच लाख रुपये किए जाने की मांग उठाई है लेकिन मौजूदा वक्त को देखते हुए सरकार के लिए यह संभव नहीं है। इससे बड़ी संख्या में लोग आयकर के दायरे से बाहर हो जाएंगे। किसी देश की अर्थव्यवस्था आयकर दाताओं द्वारा कर देने पर ही निर्भर करती है।
अब सवाल उठता है कि आयकर छूट सीमा कितनी रखी जाए? इस मामले पर औद्योगिक संगठन सीआईआई ने अपनी राय में कहा था कि आयकर छूट की सीमा में कुछ बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए, लेकिन 10 लाख से ऊपर की आय पर लगने वाले 30 प्रतिशत कर को अधिक बताते हुए इसमें संशोधन की मांग की थी।
औद्योगिक मामलों के मुख्य अर्थशास्त्री एसपी शर्मा ने कहा कि सालाना पांच लाख रुपये अब नया सामान्य स्तर बन गया है। इसलिए आयकर की छूट की सीमा को पांच लाख रुपये की कर देनी चाहिए।
एक रिटायर बैँक मैनेजर ने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए कि वह सरकारी कर्मियेां के वेतन भत्ते में कितनी वृद्धि प्रत्येक वर्ष होती है। कम से कम उतनी ही राशि को हर वर्ष आयकर सीमा से बाहर रखनी चाहिए।
एक निजी विद्यालय के संचालक ने कहा कि सरकार चाहती है कि प्रत्येक आयकर दाता अथवा आयकर के दायरे मेें आने वाला व्यक्ति ईमानदारी से अपना कर समय से चुकाए तो उसे आयकर की दरों में परिवर्तन करना होगा।
एक आईसीए धारक युवा का कहना है कि आयकर से सरकार अवश्य ही अच्छी खासी आय होती है। इसमें थोड़ा बहुत अंतर करना सरकार के लिए घातक हो सकता है। इसके लिए सरकार को विकल्प तलाश कर देश की आर्थिक मंदी के शिकार लोगों को खास रियायत देनी चाहिए क्योंकि सरकारी कर्मचारियों को तो वेतन भत्ते सरकार स्वयं देती है उसमें वह अपनी आवश्यकता नुसार घटत बढ़त स्वयं कर लेती है लेकिन आर्थिक मंदी का शिकार हुआ कारोबारी अपनी व्यथा किसको बताए।
सामान्य गृहणी ने बताया कि सरकार जब अपना बजट बनाती है तो वह उसमें नफा नुकसान का हिसाब-किताब करती है और वह यह प्रयास करती है कि उसके बजट में घाटा कम से कम हो तो उसी तरह आम आदमी के जीवन का बजट जमीनी स्तर पर बनाना चाहिए और उसमें देखना चाहिए कि कितनी आय वाले को कर देने में परेशानी नहीं होगी। उसी सीमा को आयकर से मुक्त रखना चाहिए। 

छोटे बचत खाता धारकों को सरकार ने दिया गिफ्ट

नोटबंदी के बाद बैंकों ने अपने यहां के बचत खाते सहित सभी प्रकार के खातों पर ब्याज दरों को घटा कर जनता के पैसे की कमाई का कम कर दिया है लेकिन सरकार ने इन छोटी बचत योजनाओं से लाभ उठाने वालों पर मेहरबानी दिखाते हुए मार्च माह तक की साल की पहली तिमाही में व्याज दर में किसी प्रकार की कमी न करके बचतकर्ताओं को एक तरह से नए साल का तोहफा दिया है। सरकार ने पीपीएफ और किसान विकास पत्र पर अक्टूबर से दिसम्बर की तिमाही में मिलने वाले ब्याज की दरों को जनवरी 2017 से मार्च 2017 तक बरकरार रखने का निर्णय लिया है।
वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार पिछले साल सरकार ने यह फैसला लिया था कि बचत बैंक पर ब्याज दरों की हर तीन माह में समीक्षा की जाएगी उसके बाद नई दरों का ऐलान किया जाएगा। इस बार अक्टूबर से दिसम्बर के बाद नोटबंदी के चलते यह समीक्षा नहीं हो पाई है इसलिए सरकार ने वहीं पुरानी दरों को जारी रखने का निश्चय किया है जबकि बैँकों ने यह दरें कम कर दीं हैं।
सूत्रों के अनुसार पीपीएफ पर पहले की तरह एक वर्ष से पांच वर्ष की योजना पर 8 परसेंट ब्याज मिलता रहेगा। इसी तरह किसान विकास पत्र पर 7.7 परसेंट का ब्याज मिलेगा और यह 112 माह में मॅच्योर होगी यानी इस अवधि के बाद इसे भुनाया जा सकेगा। बालिकाओं के कल्याण के लिए प्रचलित सुकन्या समृद्धि स्कीम पर 8.5 परसेंट का ब्याज मिलेगा । सीनियर सिटीजन के सेविंग स्कीम पर भी इसी तरह की 8.5 परसेंट का ब्याज मिलेगा। सीनियर सिटीजन्स को ब्याज की राशि हर तीन माह में उनके खाते में डाली जाएगी। पांच साल की रिकरिंग डिपाजिट पर पूर्व की भांति 7.5 परसेंट का ब्याज मिलता रहेगा।

Sunday, 1 January 2017

युवा हृदय सम्राट प्रधानमंत्री के नाम युवा की पाती

बैँकों से एजूकेशन लोन पर भी कुछ कहिए

सन् 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी पर सबसे अधिक विश्वास युवाओं ने किया। सच कहें इसी युवा ने नरेन्द्र मोदी को प्रचंड समर्थन देकर बहुमत वाली सत्ता जिसकी कल्पना नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के झंडावरदारों ने कभी की नहीं होगी। इतिहास गवाह है कि युवाओं ने जब-जब चाहा निजाम बदल दिया। चाहे वह स्वतंत्रता संग्राम के मंगल पांडे से लेकर भगत सिंह, राज गुरु, अशफाक उल्ला खान, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाष चन्द्र बोस जैसे तो मात्र उदाहरण हैं, इन लोगों को अंग्रेजों को देश से खदेडऩे की पटकथा लिख कर अपनी जवानी की कहानी लिख दी थी। इसी तरह आजादी के बाद से लगातार सत्ता में कब्जा जमाए रखने वाली इंदिरा गांधी का तख्ता पलट युवाओं ने ही किया था। अब पिछली सरकार को युवाओं ने ही सत्ता से बाहर किया है। प्रधानमंत्री जी सिर्फ इतनी सी बात कहना चाहता हूं कि आप देशहित में अनेक कार्य कर रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था की सफाई करने के लिए नोटबंदी एवं बेनामी एक्ट लागू करने का बहुत ही अच्छा काम किया है। इसके अच्छे एवं सुखद नतीजे भी दिखने लगे हैं। इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। जब आपने 31 दिसम्बर को बुजुर्गों,किसानों,गर्भवती महिलाओं एवं कर्जदारों को राहत देने के अनेक ऐलान किए। काफी सुखद अनुभूति हुई। बैंकों ने आपके बयान को आदेश मानकर अपने ऋण पर ब्याज कम कर दिए लेकिन यह ब्याज सिर्फ आवास और कार लोन पर कम किए हैं।
आपको मालूम हो कि एक युवा आजकल अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कौन-कौन से उपाय नहंीं करता। आजकल की महंगाई पढ़ाई पढऩे के लिए अपना खेत बेच डालता है, घर गिरवीं रख देता है, इस पर भी काम नहीं चलता तो बैंक से एजूकेशन लोन लेता है। महंगी पढ़ाई के बाद जब वह रोजगार तलाशने को निकलता है तो बाजार की मंदी, जबर्दस्त कंपटीशन की मार झेलता है। उधर बैंक द्वारा एजूकेशन लोन पर भारी भरकम 13.5 परसेंट का ब्याज लगाया जाता है। एक समय के बाद लोन लेने वाले युवक को रोजगार मिला हो या न मिला है उसके बचत बैँक खाता से जमा राशि को अपने हक में काट कर उसे ईएमआई देने को बाध्य कर देता है। परिवार का मुखिया किसी कारण से बेरोजगार हो जाता है, उसके परिवार की कोई सम्पत्ति या आय का अन्य साधन नहीं है तो ऐसे परिवार के समक्ष इस भारी भरकम ब्याज वाले लोन आत्महत्या का कारण बन सकता है। यह परिस्थिति आपके समक्ष इसलिए बयान की जा रही ताकि आपको जिन युवाओं ने अपने कंधे पर उठाकर प्रधानमंत्री बनाया है उसमें से बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे युवाओं का है जो बैँक के भारी भरकम ब्याज के बोझ तले दब कर दर्दनाक स्थिति झेलने को तैयार हैं। आने वाले समय में पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं और इसके दो साल बाद ही 2019 में लोकसभा के चुनाव फिर आने वाले हैं। इस मिनी आम चुनाव और आम चुनाव में युवाओं की भूमिका अहम रहने वाली है। यदि आप इस एजूकेशन लोन के बारे में भी बैंकों को कुछ निर्देश देंगे तो युवा आपका पक्का वोट बैंक बन सकता है। युवा के दिल के दर्द को जानें तो बेहतर होगा।

अब चुनाव में प्रत्याशियों पर चलेगा सुप्रीम कोर्ट का डंडा

धर्म,जाति,भाषा और समुदाय के नाम पर नहीं मांग सकेेंगे वोट

पांच राज्यों की विधानसभा के चुनावों की तैयारी चल रहीं है। इन राज्यों की सत्ता में आने के लिए राजनीतिक दल साम,दाम,दंड और भेद की रणनीति अपनाने में जुटे हैं। इनकी निगरानी के लिए चुनाव आयोग पहले से कमर कसे हुए है और वह राजनीतिक दलों पर अपनी नजर बनाए रखे हैं। चुनाव आयोग के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपना अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि अब उम्मीदवार चुनाव के दौरान धर्म,जाति,भाषा और समुदाय के नाम पर वोट नहीं मांग सकेंगें। ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना होगा।
हिन्दुत्व मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों वाली संविधान पीठ में शामिल 3 के मुकाबले 4 के बहुमत के आधार पर सुनाए गए निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी उम्मीदवाद धर्म,जाति,भाषा और समुदाय के नाम पर वोट न मांगे। ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना होगी। इसके लिए दोषी व्यक्ति को कठघरे में भी खड़ा किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया धर्मनिरपेक्ष कार्य है। इसकी प्रक्रियाओं में से धर्मनिरपेक्षता लागू किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि व्यक्ति और ईश्वर के बीच कर रिश्ता वैयक्तिक चीज है, इसमें राज्य को इस तरह की किसी भी गतिविधि से बचना चाहिए जो धर्म,जाति,भाषा और समुदाय से संबंध रखती हों। 

ब्याज घटाने से बैंकों को भी होगा लाभ

यह बात देखने सुनने में अवश्य ही अटपटी लग रही होगी लेकिन सत्य यही है कि बैंकों को ब्याज घटाने से लाभ मिलेगा। अब आइए देखते हैं कि किस तरह से लाभ मिलेगा। नोटबंदी के बाद बैंकों के पास वर्तमान समय में लगभग 13 लाख करोड़ रुपया तो पुराने नोटों का जमा है। इसके अलावा और भी करंसी जमा हो सकती है। यदि हम यह कहें कि वर्तमान में बैंकों के पास करंसी का 90 परसेंट से अधिक रुपया जमा है तो कोई गलत बात नहीं होगी। इनमें से 30 प्रतिशत नकदी टर्नओवर में घूम रही होगी बाकी 60 परसेंट करंसी तो बैंकों के पास जाम पड़ी है। इस करंसी पर प्रतिदिन के हिसाब से कितना ब्याज बैंकों को मिलता वह तो रुका हुआ है। कई बैकों को अपने रोजमर्रा के खर्चे चलाने के लिए रिजर्व बैंक से अपनी ऐसेट्स को इस्तेमाल करने की गुहार लगानी पड़ रही है। फिर बैंकों ने पहले से ही बचत बैंक समेत अन्य खातों पर अपना ब्याज घटाकर इतनी बचत कर ली है कि वह कुछ समय तक कम ब्याज पर लोन दे ही सकते हैं। अधिकांश बैंक हर तिमाही पर अपने टर्नओवर की समीक्षा करने के बाद ब्याज की दरों में घटबढ़ करते हैं। फिलहाल तीन महीने की तो बात है। इसके लिए बैंक पहले ही तैयार हो चुके हैं। बैँकों में जाम करंसी को बाजार में फैलाने और कमाने के लिए इस तरह के कदम उठाना घाटे का सौदा नहीं बल्कि फायदे का सौदा है। जो अभी तक ब्याज लेने के बारे में सोच नहीं रहे होंगे वह अब बैंकों के दरवाजे पर दस्तक देंगे। इस तरह से बैंकों के ग्राहक बढ़ेंगे। जब ग्राहक बढ़ेंगे निश्चित रूप से बैंकों को लाभ होगा। यह लाभ इस तरह की तकनीक पर होगा कि एक व्यापारी अपने पुराने रेट पर अड़े रह कर एक वस्तु बेच कर लाभ कमाना चाहता है जबकि चालाक व्यापारी उसमें से कुछ परसेंट लाभ घटाकर नए-नए ग्राहकों को आकर्षित करके सौ वस्तु बेच लेता है। सौ वस्तुओं बेचने वाले व्यापारी का दोहरा फायदा होता है एक तो सौ नए ग्राहक बनें। और इन सौ ग्राहकों से अधिक लाभ भी मिला। इन नए ग्राहकों के माध्यम से और नए ग्राहक आने का अवसर भी मिला। इस तरह से ब्याज घटाने वाले बैंकों को तिहरा लाभ मिलेगा। 

अमीर भी कहें नोटबंदी जिंदाबाद

विमुद्रीकरण या नोटबंदी से सिर्फ गरीबों को ही फायदा नहीं होगा बल्कि कानून कायदा मानने वाले हरेक व्यक्ति को लाभ होगा इसके लिए आपको ईमानदारी बरतनी होगी पुरानी तिकड़म छोडऩी होगी।यह कहना है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का। अब देखते हैं कि प्रधानमंत्री ने अपनी घोषणा से जहां गरीबों को लाभ पहुंचाया है वहीं अमीरों को बैंक के लोन के ब्याज में हुई कमी से उससे अधिक लाभ मिलने जा रहा है। स्टेट बैंक सहित कई बैंकों द्वारा कम की ब्याज दरों से 20 से 25 साल तक की लंबी अवधि के लिए कर्ज लेने वाले लोगों को इससे फायदा होगा। एक साथ ब्याज दर में 90 बेसिस पॉइंट्स की कटौती किए जाने से 25 साल के होम लोन का समय सीधे तौर पर करीब 5 साल कम हो जाएगा। ऐसे में 20 साल का लोन करीब 3 साल कम हो जाएगा। ब्याज दर में कटौती होने पर बैंकों की ओर से आमतौर पर ईएमआई की राशि में कमी नहीं होती है, लेकिन नए रेट्स के मुताबिक किस्तों की संख्या में जरूर कमी हो जाती है। 50 लाख रुपये का लोन 25 साल का है और यदि ब्याज दर 9.15 पर्सेंट की बजाय 8.25 पर्सेंट होता है तो उसे हर महीने 3,000 रुपये से ज्यादा की बचत होगी। ब्याज दर 9.15 पर्सेंट है तो आपको पूरे 300 महीने तक 42,475 की ईएमआई भरनी पड़ती। लेकिन अब इस रेट के 8.25 पर्सेंट होने पर आप 242 महीने में लोन से फ्री हो जाएंगे। इस तरह आपके लोन की ईएमआई 58 महीने कम हो जाएगी। इस तरह से आपको 24 लाख, 63 हजार और 150 रुपये का सीधे-सीधे लाभ होगा। अब क्यों न कहें नोटबंदी जिंदाबाद। 50 लाख का लोन कोई गरीब आदमी या मध्यम वर्ग का  व्यक्ति नहीं ले सकता। इस तरह के लोन लेने के लिए बैंकों को आय का स्रोत भी इतना बड़ा दिखाना पड़ता है। इसलिए निश्चित रूप से अमीर आदमी को इससे बहुत अधिक लाभ होगा।

बेघर गरीबों पर नोटबंदी से ऐसे हुई धनवर्षा

नोटबंदी के निर्णय को लागू किए जाने से ही चारों ओर इसकी आलोचना हो रही थी लेकिन इस निर्णय के सूत्रधार अकेले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार यह कह रहे थे कि लंबे समय में इस फैसले का सीधा लाभ गरीबों को मिलेगा। यह बात अब सच हो कर सबके सामने आ रही है। नोटबदली की तय मियाद 30 दिसंबर को समाप्त होने के बाद बैंकों के बाद पिछले 25 सालों में सबसे अधिक करंसी जमा हो गई है। इस दौरान सभी लोगों के कारोबार ठप पड़े हैं तो बैंकों का कारोबार भी ठप है। अब अपना कारोबार चलाने के लिए होम लोन सस्ते कर दिए गए हैं। एसबीआई समेत कई बैंकों ने अपने आवासीय ऋण में 0.5 परसेंट की कमी की है। अब 75 लाख रुपये तक के लोन आपको 9.1 परसेंट ब्याज की जगह 8.6 परसेंट पर मिलेगा। यदि हम बेघर गरीबों या निम्न मध्यम वर्ग की करें तो उन्हें नौ लाख रुपये तक के ऋण पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ब्याज में 4 परसेंट की छूट का वादा किया है। यदि कोई गरीब व्यक्ति मकान बनवाना चाहता है और वह इसके लिए 9 लाख रुपये का लोन लेता है तो वह प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी उठाना चाहता है तो उसको यह ब्याज 8.6 परसेंट की जगह पर 4 परसेंट पर ही पड़ेगा। अब मात्र चार परसेंट ब्याज पर मकान बनवाने का आपका सपना पूरा हो सकता है। नोटबंदी का गरीबों का इतना बड़ा लाभ पहले कभी नहीं मिला होगा। 

अब उत्तर प्रदेश का क्या होगा?

उत्पन्न हो सकता है संवैधानिक संकट

समाजवादी पार्टी में चल रहे घमासान के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विवादों के घेरे में आ गए हैं। इसके चलते अब यह सवाल उठ खड़ा होगा कि उत्तर प्रदेश का संवैधानिक भविष्य क्या होगा? विधानसभा भंग होगी, राष्ट्रपति शासन लगेगा,मुख्यमंत्री कार्यवाहक मुख्यमंत्री बनेंगे या फिर अखिलेश यादव की सरकार गिरेगी? इन सभी विकल्पों पर विचार करके देखते हैं कि तो पहला सवाल यह है कि अखिलेश यादव के खिलाफ बगावत पर उतारू शिवपाल सिंह यादव के समर्थन में कुछ विधायक हुए तो उन्हें राज्यपाल के पास भेजकर यह फरियाद कर सकते हैं कि अखिलेश सरकार अल्पमत में है। राज्यपाल उनकी इस फरियाद पर अखिलेश यादव को शक्ति परीक्षण के लिए कह सकते हैं और अल्पमत होने पर सरकार को पराजय का मुंह देखना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। या इस दावे पर सरकार को मौका दिए बिना ही राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। दूसरा यह है कि अखिलेश यादव फिलहाल पूर्ण बहुमत में हैं और भविष्य में किसी प्रकार की आशंका को देख कर वह राज्यपाल से विधानसभा को भंग करने की सिफारिश करके कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रह कर चुनाव लड़ सकते हैं। इस पर भी राज्यपाल के विवेक पर अंतिम कार्यवाही का रुख तय होगा। यूपी के सियासी माहौल की नब्ज टटोलते हुए केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार नोटबंदी के बाद उत्पन्न स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने के पक्ष में हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा,आने वाला वक्त ही बताएगा। 

तो अब असली-नकली समाजवादी पार्टी का सवाल

चुनाव चिन्ह साइकिल हो सकता है जब्त?

समाजवादी पार्टी में नया साल का पहला दिन घमासान भरा रहा। कुल मिलाकर पार्टी दो फाड़ हो चुकी है। अखिलेश उगते हुए सूर्य और मुलायम सिंह अस्त होते सूर्य की तरह निखर कर सामने आ गए हैं। चचा राम गोपाल यादव ने अखिलेश (टीपू ) को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष  (सुल्तान)तो बन दिया। कानून के तौर पर अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए लम्बा रास्ता तय करना होगा। इसमें काफी समय लगेगा।  साथ ही अमर सिंह और शिवपाल सिंह को पार्टी से बाहर निकाल दिया। यही नहीं अखिलेश समर्थकों ने पार्टी कार्यालय पर कब्जा करके शिवपाल सिंह की नेमप्लेट हटा दी। कुरुक्षेत्र बने पार्टी कार्यालय पर घंटों अखिलेश समर्थकों का हंगामा चलता रहा। बाहर सुरक्षा बलों की भारी फौज अब भी तैनात है। अखिलेश यादव ने नरेश उत्तम को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है।
अखिलेश यादव और राम गोपाल का निष्कासन वापस लेने वाले सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव ने पलटी मारते हुए फिर से अपनी त्यौरियां चढ़ा लीं हैं। उनका गुस्सा अखिलेश पर कम राम गोपाल यादव पर अधिक दिखा और उनके कोपभाजन के शिकार उनके चहेते नरेश अग्रवाल, किरणमय नंदा और रेवती रमण जैसे दिग्गज नेता हुए। सुबह रामगोपाल द्वारा बुलाये गये पार्टी के आपातकालीन राष्ट्रीय सम्मेलन को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने असंवैधानिक करार देते हुए इसे पार्टी विरोधियों की बैठक करार दिया। साथ ही अल्टीमेटम जारी किया कि जो पार्टी कार्यकर्ता व नेता इस सम्मेलन में भाग लेगा, उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी। उन्होंने पार्टी के संविधान की 14 (2) का हवाला देते हुए बताया कि यह राष्ट्रीय अधिवेशन पार्टी अध्यक्ष द्वारा नहीं बुलाया गया था, इसलिए मान्यता नहीं दी जा सकती। इस धारा के तहत यदि पार्टी के गुट को किसी तरह की आपत्ति है और अपनी बात कहने के लिए पार्टी अध्यक्ष से राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने का आग्रह कर सकता है। अध्यक्ष द्वारा बात न मानने पर वह गुट अध्यक्ष को अल्टीमेटम देकर अपना स्वतंत्र राष्ट्रीय अधिवेशन बुला सकता है। इस मामले में रामगोपाल ने यह प्रक्रिया नहीं अपनाई। पार्टी सुप्रीमों ने अखिलेश यादव के साथ मंच साझा करने वाले नरेश अग्रवाल और पार्टी उपाध्यक्ष किरणमय नंदा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। रामगोपाल यादव को भी फिर तीन दिन मेंं दूसरी बार पार्टी से निकाल दिया है। अखिलेश यादव के नाम पर उन्होंने अभी चुप्पी साध रखी है। उन्होंने अब अपना पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन 5 जनवरी 2017 को बुलाया है। इस बीच पार्टी नेताओं के प्रचंड समर्थन से अखिलेश यादव के हौसले बुलंद हैं। वह अपनी पार्टी को असली समाजवादी पार्टी करार देकर साइकिल चुनाव चिन्ह चुनाव आयोग से मांगेगे। विवाद के चलते चुनाव चिन्ह साइकिल जब्त भी हो सकता है। सपा के घमासान के बाद असली और नकली समाजवादी पार्टी का सवाल उत्पन्न हो गया है।

ये है डिजिटल पेमेंट पर मंडराता खतरा

डिजिटल इंडिया अभियान के लिए साइबर सुरक्षा की बात जानकार लोगों ने काफी पहले क्यों उठाई थी, इसका खुलासा उस समय हुआ जब देश की सुरक्षा के सिरमौर संगठन एनएसजी की वेबसाइट को संदिग्ध आतंकवादी संगठन ने हैक कर दी। ऐलान इंजेक्टर नाम के हैकर गु्रप ने एनएसजी की वेबसाइट को हैक कर जमकर उत्पात मचाया । वेबसाइट पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अभद्र कमेंट किए गए हैं। भारत की छवि खराब करने के लिए पुलिस द्वारा लाठी चार्ज किए जाने का एक तस्वीर भी डाल दी है। यह तो वेबसाइट हैक करने की घटना और उस पर उपद्रव करने वालों की करतूत लेकिन इन हैकरों ने वेबसाइट से क्या महतवपूर्ण जानकारी हासिल कर ली है। उस जानकारी का वह किस तरह से फायदा उठाएंगे। क्योंकि एनएसजी ही वह संगठन है जब सारे सुरक्षा संगठन किसी अभियान में नाकाम हो जाते हैं तो एनएसजी को काबू करने के लिए भेजा जाता है। इसलिए इस संगठन की कार्यप्रणाली व कार्यालयों की जानकारी हासिल करना कोई मामूली बात नहीं है। जब इतना महत्वपूर्ण संगठन की वेबसाइट पर खतरा हो सकता है तो बैँकों की वेबसाइटों की बात क्या की जाए? क्योंकि हैकर तो कहीं भी अपना कमाल दिखा सकते हैं। हैकर जब अमेरिका के सुरक्षा विभाग पेंटागन को नही बख्शते तो फिर इंडिया की बैंकों के डाटा कितने सुरक्षित हैं,इस पर विचार करने की आवश्यकता है। इसलिए एक बार पुन: यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि डिजिटल पेमेंट के लिए हाई लेबल की साइबर सिक्योरिटी की आवश्यकता है।