उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। सभी दलों में खलबली मच चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस अतिविश्वास से अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा है कि 2019 की चिंता छोड़ो और 2024 की तैयारी में लग जाओ, वह कहीं भारी न पड़ जाए। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अच्छा कार्य कर रही है, लेकिन यहां चाटुकारों के चलते उसकी किरकिरी भी हो रही है। ऐसे में 2014 के चुनावों में अपना सब कुछ गंवाए सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी नई पारी कुछ ज्यादा ही जोश से शुरू की है। इलाहाबाद विश्व विद्यालय के छात्रसंघ के चुनाव में सपा को मिली सफलता से उन्हें संजीवनी मिल गई है। इस बीच निकाय चुनाव में मची दलों के भगदड़ में सपा को काफी लाभ मिल रहा है। इससे यह टैम्पो बन रहा है कि निकाय चुनावों में सपा चौँकाने वाले परिणाम दे सकती है। यदि यह सच रहा तो मोदी के लिए 2019 का आम चुनाव कम से कम उत्तर प्रदेश में महंगा पड़ सकता है। उसका कारण योगी सरकार की कार्यशैली से असंतुष्ट जनता और टिकट की मारामारी से असंतुष्ट पार्टी नेता अपना बागी रोल तो निभायेंगे। ऐसे में भाजपा को उतनी प्रचंड जीत नहीं मिल पाएगी जितनी 2014 में मिल चुकी है। वैसे भी यह कहा जा रहा है कि 2014 में जीत भाजपा को नहीं बल्कि सपा के हिन्दू विरोधी रवैये से सफलता मिली थी। रहा सवाल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का तो वह तो सभी के सामने स्पष्ट है कि सपा के यादव कुनबे में महाभारत न होती तो भाजपा का परिणाम इतना सकारात्मक न होता। यह तो चुनाव से पहले भाजपा नेता स्वयं ही स्वीकार रहे थे।
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Saturday, 28 October 2017
क्या कांग्रेस से सबक लेगी भाजपा?
चेहरा से बड़ा कद होगा पार्टी का या...
भारतीय जनता पार्टी आजकल सफलता की सीढिय़ों पर लगातार अग्रसर है। इस सफलता का श्रेय भाजपा की जगह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। लेकिन यहां पर यह गहन मंथन करने की आवश्यकता है कि भाजपा क्या हमेशा लोकप्रिय चेहरे पर निर्भर रहेगी। इतिहास में झांके तो दूसरी बार यह सफलता भाजपा को नहीं लोकप्रिय चेहरे को मिली है। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी का चेहरा था अब नरेन्द्र मोदी का चेहरा है। यही कुछ किस्सा कांग्रेस का है। कांग्रेस के पास जब तक लोकप्रिय चेहरा रहा तब तक वह सत्ता की सीढिय़ों पर चढ़ती रही। इसके अलावा कांग्रेस को दो मौके सहानुभूति लहर के मिले। पार्टी इन अवसरों को भुनाने की जगह सत्ता को अपनी बपौती मान बैठी। जनता को विकल्पविहीन मान बैठी। हालांकि जनता ने इसी कांग्रेस को सहानुभूति लहर का लाभ देते हुए 10 वर्ष तक झेला। झेला इसलिए कहेंगे कि जनता की आवाज को कोई सुनने वाला नहीं था और न ही कोई जवाब देने वाला था। प्रधानमंत्री पद पर मनमोहन सिंह नेता कम अधिकारी अधिक थे। अधिकारी काम करता है और नेता बोलता है। अधिकारी की भूमिका मनमोहन सिंह ने अच्छी निभाई परन्तु एक परिपक्व नेता की भूमिका जो राहुल गांधी को निभानी चाहिए थी, उसकी जगह बचकानी हरकत करते नजर आए। और देश के प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी और अपने परिवार का नौकर की तरह ट्रीट किया। मनमोहन सिंह की सत्ता के दूसरे कार्यकाल में तो अति ही कर दी। किंगमेकर की तरह सरकार को रोज-रोज डांटना फटकारना, वह भी पब्लिकली। इस पर मनमोहन सिंह जब सत्ता में शामिल होने को कहते, उप प्रधानमंत्री बनने को कहते, प्रधानमंत्री पद की पेशकश तक की, तब चुप रहे। यह सब नजारा जनता से छिपा भी नहीं रहा। इसका असर आज जो दिख रहा है वह सब सामने है। आज गुजरात के चुनाव में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी पूरा जोर लगा रहे हैं लेकिन हालात यह है कि हार्दिक पटेल उनसे ज्यादा लोकप्रिय हैं और कांग्रेस को धमकी दे रहे हैं। कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी का चेहरा था, सत्ता में लगातार रही, उसके बाद सहानुभूति लहर से राजीव गांधी सत्ता में आए और चले गए। दूसरी बार वह अपनी मेहनत और लोकप्रियता के चलते सत्ता में आते-आते रह गए। आने वाले ही थे कि ईश्वर ने उनके साथ बहुत दुखद हादसा कर दिया। इसके बाद सहानुभूति लहर में कांग्रेस फिर सत्ता में आई लेकिन चेहरा राजीव गांधी का ही रहा। इसके बाद जो दुर्गति कांग्रेस की हुुई वह सब जानते ही हैं। अब सवाल भाजपा का है कि क्या वह कांग्रेस से सबक लेना चाहेगी। क्या वह लोकप्रिय चेहरे को पार्टी से ऊपर रखेगी या पार्टी का कद बढ़ाएगी। गुजरात के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोद को जरूर समझ में आ रहा होगा कि चेहरा अब पार्टी पर भारी पड़ रहा है। उनके स्वयं के सिवाय कोई और जनता के बीच लोकप्रिय नहीं है और इसलिए मोदी को गुजरात में अधिक जोर लगाना पड़ रहा है। बेहतर तो यही होगा कि मोदी अभी से अपने चेहरे से अधिक भाजपा को अधिक लोकप्रिय बनाएं तो पार्टी का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है क्योंकि मोदी का चेहरा कब तक लोकप्रिय रहेगा कोई नहीं जानता। शायद इसकी शुरुआत जल्द ही हो। वरना भाजपा के कांग्रेस बनते देर नहीं लगेगी।Friday, 27 October 2017
निकाय चुनाव अगले माह, होगा दिग्गजों का पॉलिटिकल टेस्ट
उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है। इन चुनावों से भाजपा की ओर से सीएम योगी आदित्यनाथ, कांग्रेस की ओर राहुल गांधी, सपा की ओर से अखिलेश यादव व बसपा की ओर से सुश्री मायावती की कड़ी परीक्षा होगी। युपी के इस चुनाव को 2019 के आम चुनाव का मिनी चुनाव माना जा रहा है क्योंकि इन्ही चुनाव से आम चुनाव के लिए राजनीतिक दलों की नींव रखी जाएगी।
चुनाव तीन चरण में होगा। पहले चरण की वोटिंग 22 नवंबर, दूसरा 26 नवंबर और तीसरे चरण की वोटिंग 29 नवंबर को होगी। चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ प्रदेश में आचार संहिता लागू हो गई है। यूपी के राज्य निर्वाचन आयुक्त एसके अग्रवाल ने शुक्रवार को नगर निकाय सामान्य निर्वाचन 2017 की अधिसूचना जारी की। 16 नगर निगम, 198 नगर पालिका परिषद, 438 नगर पंचायत में चुनाव कराया जाएगा। कुल मतदाताओं की संख्या 3.32 करोड़ है। जिनमें 53.5 फीसदी पुरुष और 46.5 फीसदी महिलाएं हैं।
नगर पालिका परिषद और नगर पंचायत के वैलेट पेपर से होंगे। वोटिंग तीन चरणों में होगी। पहला चरण 22 नवंबर को होगा जिसमें 25 जिलों में 5 नगर निगम के लिए वोटिंग होगी। दूसरे चरण का मतदान 26 नवंबर को होगा। इसमें 6 नगर निगम हैं। जबकि तीसरे और आखिरी चरण के लिए 29 नवंबर को मतदान होगा। वहीं मतगणना 1 दिसंबर को सुबह 8 बजे से होगी।
अब नगर निगम से जुड़े सभी राजस्व, गृह और नगर विकास के विभागों में नियुक्ति और ट्रान्सफर पर प्रतिबंध रहेगा। चुनाव तक सभी डीएम और एसएसपी अपने जिले को नहीं छोड़ सकेंगे। आयोग की पूर्व अनुमति से ही डीएम और एसएसपी ऐसा कर सकते हैं।
कानपुर और लखनऊ के मेयर 25 लाख खर्च कर सकते हैं। इसके अलावा मेयर 20 लाख खर्च कर सकते हैं। अभी तक साढ़े 12 लाखरुपये खर्च कर सकते थे। वहीं पार्षद 2 लाख रुपये खर्च कर सकते हैं। अभी तक ये 1 लाख रुपये खर्च कर सकते थे। नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष अब 8 लाख रुपये खर्च कर सकते हैं। इससे पहले सिर्फ 4 लाख रुपये ही खर्च कर सकते थे। सभी प्रत्याशियों को अपना खर्च देना होगा। जिले के जिलाधिकारी के नेतृत्व में टीम गठित होगी।
यूपी में इस बार 16 सीटों के लिए मेयर का चुनाव हो रहा है। आगरा, इलाहाबाद, बरेली, मुरादाबाद, अलीगढ़, झांसी और फैजाबाद की सीटों को अनारक्षित रखा गया है। वहीं फिरोजाबाद, बनारस, सहारनपुर और गोरखपुर की मेयर सीट ओबीसी के लिए आरक्षित की गई है। मेरठ की सीट एससी महिला के लिए रखी गई है। गाजियाबाद में महिला सामान्य के लिए आरक्षित रखा गया है। इस बार चार निगमों में पहली बार मेयर का चुनाव हो रहा है। इनमें सहारनपुर, फिरोजाबाद, मथुरा और फैजाबाद नगर निगम शामिल हैं।
पहले चरण में यहां होंगे चुनाव (22 नवंबर)
शामली, मेरठ, हापुड़, बिजनौर, बदायूं, हाथरस, कासगंज, आगरा, कानपुर, जालौन, हमीरपुर, चित्रकूट, कौशाम्बी, प्रतापगढ़, उन्नाव, हरदोई, अमेठी, फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, गोरखपुर, आजमगढ़, गाजीपुर और सोनभद्र में चुनाव होंगे।
दूसरे चरण में यहां होंगे चुनाव (26 नवंबर)
लखनऊ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, अमरोहा, रामपुर, पीलीभीत, शाहजहांपुर, अलीगढ़, मथुरा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, इटावा, ललितपुर, बांदा, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, अम्बेडकरनगर, बहराइच, श्रावस्ती, संतकबीरनगर, देवरिया, बलिया, वाराणसी और भदोही में मतदान होगा।
तीसरे चरण में इन जिलों में मतदान (29 नवंबर)
सहारनपुर, बागपत, बुलंदशहर, मुरादाबाद, संभल, बरेली, एटा, फिरोजाबाद, कन्नौज, औरैया, कानपुर देहात, झांसी, महोबा, फतेहपुर, रायबरेली, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, बाराबंकी, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, कुशीनगर, मऊ, चंदौली, जौनपुर और मिर्जापुर में वोट पड़ेंगे।
चुनाव तीन चरण में होगा। पहले चरण की वोटिंग 22 नवंबर, दूसरा 26 नवंबर और तीसरे चरण की वोटिंग 29 नवंबर को होगी। चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ प्रदेश में आचार संहिता लागू हो गई है। यूपी के राज्य निर्वाचन आयुक्त एसके अग्रवाल ने शुक्रवार को नगर निकाय सामान्य निर्वाचन 2017 की अधिसूचना जारी की। 16 नगर निगम, 198 नगर पालिका परिषद, 438 नगर पंचायत में चुनाव कराया जाएगा। कुल मतदाताओं की संख्या 3.32 करोड़ है। जिनमें 53.5 फीसदी पुरुष और 46.5 फीसदी महिलाएं हैं।
नगर पालिका परिषद और नगर पंचायत के वैलेट पेपर से होंगे। वोटिंग तीन चरणों में होगी। पहला चरण 22 नवंबर को होगा जिसमें 25 जिलों में 5 नगर निगम के लिए वोटिंग होगी। दूसरे चरण का मतदान 26 नवंबर को होगा। इसमें 6 नगर निगम हैं। जबकि तीसरे और आखिरी चरण के लिए 29 नवंबर को मतदान होगा। वहीं मतगणना 1 दिसंबर को सुबह 8 बजे से होगी।
अब नगर निगम से जुड़े सभी राजस्व, गृह और नगर विकास के विभागों में नियुक्ति और ट्रान्सफर पर प्रतिबंध रहेगा। चुनाव तक सभी डीएम और एसएसपी अपने जिले को नहीं छोड़ सकेंगे। आयोग की पूर्व अनुमति से ही डीएम और एसएसपी ऐसा कर सकते हैं।
कानपुर और लखनऊ के मेयर 25 लाख खर्च कर सकते हैं। इसके अलावा मेयर 20 लाख खर्च कर सकते हैं। अभी तक साढ़े 12 लाखरुपये खर्च कर सकते थे। वहीं पार्षद 2 लाख रुपये खर्च कर सकते हैं। अभी तक ये 1 लाख रुपये खर्च कर सकते थे। नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष अब 8 लाख रुपये खर्च कर सकते हैं। इससे पहले सिर्फ 4 लाख रुपये ही खर्च कर सकते थे। सभी प्रत्याशियों को अपना खर्च देना होगा। जिले के जिलाधिकारी के नेतृत्व में टीम गठित होगी।
यूपी में इस बार 16 सीटों के लिए मेयर का चुनाव हो रहा है। आगरा, इलाहाबाद, बरेली, मुरादाबाद, अलीगढ़, झांसी और फैजाबाद की सीटों को अनारक्षित रखा गया है। वहीं फिरोजाबाद, बनारस, सहारनपुर और गोरखपुर की मेयर सीट ओबीसी के लिए आरक्षित की गई है। मेरठ की सीट एससी महिला के लिए रखी गई है। गाजियाबाद में महिला सामान्य के लिए आरक्षित रखा गया है। इस बार चार निगमों में पहली बार मेयर का चुनाव हो रहा है। इनमें सहारनपुर, फिरोजाबाद, मथुरा और फैजाबाद नगर निगम शामिल हैं।
पहले चरण में यहां होंगे चुनाव (22 नवंबर)
शामली, मेरठ, हापुड़, बिजनौर, बदायूं, हाथरस, कासगंज, आगरा, कानपुर, जालौन, हमीरपुर, चित्रकूट, कौशाम्बी, प्रतापगढ़, उन्नाव, हरदोई, अमेठी, फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, गोरखपुर, आजमगढ़, गाजीपुर और सोनभद्र में चुनाव होंगे।
दूसरे चरण में यहां होंगे चुनाव (26 नवंबर)
लखनऊ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, अमरोहा, रामपुर, पीलीभीत, शाहजहांपुर, अलीगढ़, मथुरा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, इटावा, ललितपुर, बांदा, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, अम्बेडकरनगर, बहराइच, श्रावस्ती, संतकबीरनगर, देवरिया, बलिया, वाराणसी और भदोही में मतदान होगा।
तीसरे चरण में इन जिलों में मतदान (29 नवंबर)
सहारनपुर, बागपत, बुलंदशहर, मुरादाबाद, संभल, बरेली, एटा, फिरोजाबाद, कन्नौज, औरैया, कानपुर देहात, झांसी, महोबा, फतेहपुर, रायबरेली, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, बाराबंकी, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, कुशीनगर, मऊ, चंदौली, जौनपुर और मिर्जापुर में वोट पड़ेंगे।
चाटुकारों से बचकर चलें योगी वरना....?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले एक माह से राजनीति की सुर्खियों में छाए हुए हैं। केरल में संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या के बाद निकाली गई यात्रा में भाग लेने व हरियाणा में हिन्दुत्व की लहर जगाने के लिए अथवा गुजरात में मोदी की मदद करने के लिए उनकी भूमिका को लेकर चर्चांएं हैं। इसके साथ ही यूपी में छिड़े ताज विवाद में उनकी भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। यदि सियासी नजरों से हटकर ताज विवाद की घटना को देखा जाए तो ये सिर्फ अतिशय चाटुकारिता का ही परिणाम है। सरकारी पुस्तक से ताज महल को हटाने की घटना से उत्साहित होकर अपने नंबर बढ़ाने के लिए सरधना के भाजपा विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को लेकर अनाप-शनाप बयान दे डाला। इसका नतीजा यह हुआ कि यूपी में भाजपा की देशव्यापी फजीहत होने लगी। इसे डैमेज कंट्रोल करने के लिए शीर्ष नेतृत्व ने सीएम योगी आदित्यनाथ का सहारा लिया। योगी आदित्यनाथ ने अपनी भूमिका बड़े ही अच्छे ढंग से निभाई लेकिन जैसे वीरेन्द्र सहवाग द्रविड़ नहीं बन सकते। वैसे ही योगी मोदी नहीं बन सके। हश्र ये हुआ कि मामला थमने की जगह आगे बढ़ गया है। अब देखिये कब तक इस पर विराम लगता है।
अतिशय चाटुकारिता का दूसरा नमूना कानपुर में उस समय देखने को मिला जब वहां खेलने के लिए आई भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाडिय़ों का स्वागत भगवा गमछे से किया गया, जिस पर योगी छपा हुआ था। खेल और राजनीति के इस घालमेल को सियासी कद्दावर पचा नहीं पा रहे हैं। लोग अपने नंबर बढ़ाने के चक्कर में योगी जी आपके नंबर घटा रहे हैं। आप ठहरे साधु-संत वरना अब तक तो आपको भी पसीना आ जाता। इसलिए आप अपने प्रशंसकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को एक सख्त संदेश दे दें वरना ये कहीं भी आपको ले जाकर डुबो देंगे।
अतिशय चाटुकारिता का दूसरा नमूना कानपुर में उस समय देखने को मिला जब वहां खेलने के लिए आई भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाडिय़ों का स्वागत भगवा गमछे से किया गया, जिस पर योगी छपा हुआ था। खेल और राजनीति के इस घालमेल को सियासी कद्दावर पचा नहीं पा रहे हैं। लोग अपने नंबर बढ़ाने के चक्कर में योगी जी आपके नंबर घटा रहे हैं। आप ठहरे साधु-संत वरना अब तक तो आपको भी पसीना आ जाता। इसलिए आप अपने प्रशंसकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को एक सख्त संदेश दे दें वरना ये कहीं भी आपको ले जाकर डुबो देंगे।
क्या ‘ताज’ भी ‘बाबरी मस्जिद’ बन जाएगा
आगरा में प्यार की निशानी और दुनिया के आठ अजूबों में से एक ताजमहल को लेकर जिस तरह की चर्चाएं और बयानबाजियां चल रहीं है, उनसे यही कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या खूबसूरत ताजमहल का हश्र भी बाबरी मस्जिद जैसा हो सकता है। यह बात अचानक नहीं कुछ लोगों के विचारों और घटनाओं के बाद सामने आई है। सरधना विधायक संगीत सोम ने ताज को लेकर टिप्पणी करके एक सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। इस तूफान को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी धरोहर और गौरव का सम्मान करके और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ताज परिसर में झाड़ू लगाकर रोकने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन स्थिति ज्यों-ज्यों दवा की त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता ही गया वाली हो रही है। इस तूफान की गति तेजी से बढ़ रही है। अब हर कोई इस सियासी गंगा में डुबकी लगाना चाह रहा है। जब सीएम योगी ने ताज को अपनी पुस्तिका से बाहर निकाल फेंका तो सबसे पहले सपा के आजम खां ने टिप्पणी करते हुए कहा कि छोटे बादशाह से कहो कि वह ताज गिराने चलें तो हम भी फावड़ा लेकर उनके साथ चलेंगे। इसके बाद जब बहस आगे बढ़ी तो उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति भवन, संसद,लाल किला सहित अनेको इमारतें गुलामी की निशानी हैं, इनमें से क्या-क्या गिराओगे। आजम खान यहीं पर नहीं रुके उन्होंन बढ़ते विवाद में घी डालते हुए यह भी बयान दे डाला कि ताज महल को निश्चित रूप से डायनामाइट से उड़ा दिया जाएगा। बात यहीं नहीं खत्म होती अब आजम खान के साथ फिल्म सिंघम के विलेन प्रकाश राज ने भी बयान दे डाला कि बच्चों को एक बार ताजमहल अवश्य दिखा दो क्योंकि जल्दी ही यह इतिहास बनने वाला है। उनका इशारा भी ताज के खात्मे की ओर था। अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की इतिहास की शाखा अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति ने दो टूक कह दिया है कि ताजमहल में शुक्रवार को होने वाली नमाज पर प्रतिबंध लगा दिया जाए अन्यथा दूसरे पक्ष को वहां शिव चालीसा का पाठ करने की अनुमति दे दी जाए। इसे लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ है। इस संगठन का यह तर्क है कि वहां एक मंदिर था जिसे तत्कालीन राजा ने बनवाया था। इसके समर्थन में उन्होंने कहा कि आज तक किसी नदी के किनारे किसी भी तरह का मकबरा नहीं बना देखा है बल्कि सारे मंदिर नदियें के तट पर ही होती है। इस पर ताजमहल की मस्जिद के इमाम ने कहा कि यहां पर शिव चालीसा की इजाजत नहीं दी जा सकी, बल्कि नमाज पढ़ी जा सकती है। उन्होंन इसका कारण यह बताया कि यहां पर मस्जिद है। इसलिए नमाज तो पढ़ी जा सकती है लेकिन साथ ही यह कहा कि यह तो एक कब्रिस्तान है यहां पर शिव चालीसा का पाठ नहीं किया जा सकता। संघ के संगठन ने कहा कि जब यह राष्ट्रीय धरोहर के रूप में घोषित है तो इस पर किसी एक वर्ग को धार्मिक कार्य करने की अनुमति दिया जाना अनुचित और पक्षपातपूर्ण है। यह विवाद बढ़ा और विवाद में तल्खी आई तो क्या बाबरी मस्जिद वाली स्थिति बन सकती है या नहीं, यह तो भविष्य ही बता पाएंगा।
Thursday, 26 October 2017
सूना ही रह गया धक-धक गर्ल का ताज का दीदार
बॉलीवुड की धक-धक गर्ल माधुरी दीक्षित ने भी आगरा पहुंचकर ताज का दीदार किया। इस खूबसूरत पल को उन्होंने ट्विटर पर भी शेयर किया है। लेकिन इसकी चर्चा तब हुई जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने वहां जाकर झाड़ू लगाई। माधुरी ने ट्विटर पर दो तस्वीरें शेयर की हैं। फोटो में माधुरी अपने पति, दो बेटों अरिन और रयान के अलावा परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ हैं। उन्होंने साथ ही कहा कि भारत के साथ प्यार जारी है। जय हिंद! बता दें, इसी हफ्ते माधुरी ने अपनी शादी के 18 साल पूरे किए हैं। 17 अक्टूबर 1999 को उन्होंने श्रीराम नेने से शादी की थी। श्रीराम पेशे से डॉक्टर हैं। जल्द ही माधुरी मराठी फिल्मों में अपना डेब्यू करने जा रही हैं। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी दी थी। आखिरी बार वह साल 2014 में फिल्म गुलाब गैंग में नजर आई थीं। इस बीच नेताओं के साथ ही अभिनेता और सिंघम फिल्म में खलनायक का अभिनय करने वाले प्रकाश राज ने तो यहां तक कह दिया कि देश के लोग अपने बच्चों को एक बार ताज अवश्य दिखा दें क्योंकि भविष्य में ताजमहल इतिहास की चीज बन जाएगा।
वाह ताज से भाजपा को क्या-क्या लाभ होगा?
मतों का ध्रुवीकरण के साथ यूपी के निकाय चुनाव, हिमाचल व गुजरात विस चुनाव में भाजपा की नैया होगी पार
केन्द्र में भाजपा की मोदी सरकार और भाजपा हाईकमान और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से वाह ताज करवाकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। किसी को पता ही नहीं चला कि सरधना के विधायक संगीत सोम ने भाजपा के पक्ष में मतों के ध्रुवीकरण की जो नींव रखी थी उस पर विशाल महल बनकर तैयार हो गया। आज पूरे देश में ताज महल के अलावा किसी अन्य की चर्चा नहीं हो रही है। इससे पहले जीएसटी, नोटबंदी, आर्थिक मंदी, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, अमित शाह के बेटे जयंत शाह का मामला सुर्खियों में था और लोग मोदी सरकार से इतने नाखुश थे, विशेषकर व्यापारी खुलकर अपनी भड़ास निकाल रहे थे। अब वे सब कहां गए। सारे के सारे मुद्दे ताज के गड़े मुर्दों में समा गए।मतों के ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा लाभ गुजरात को मिलने वाला है, जहां पर विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। उसके बाद इसका लाभ यूपी में होने वाले निकाय चुनाव में भाजपा को मिलेगा जो 2019 की नींव बनकर तैयार होंगे। इसके अलावा इसका अच्छा खासा असर हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी होने वाला है जहां पर कांग्रेस की सरकार है। इसका सीधा असर 2019 के आम चुनाव के नतीजों पर पडऩे वाला है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात की पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में कह चुके हैं कि आप लोग 2019 की चिंता छोड़ दो 2024 की अभी से तैयारी करो।
‘आह ताज’ से ‘वाह ताज’ के राग का क्या है राज
मात्र एक माह में यूपी के सीएम आदित्य नाथ योगी का हृदयपरिवर्तन हो गया कि अपनी सूचना प्रसारण मंत्रालय की बुकलेट से जिस ताज को बाहर निकाल फेंका आज उसी के आंगन में झाड़ू लगाते नजर आए। क्या आगरा में नगर निगम के सफाई कर्मी हड़ताल पर चले गए थे या सरकार की बात नहीं मान रहे थे। ऐसा तो कुछ भी नहीं था। ताज के सफाई अभियान को लोग भले ही डैमेज कंट्रोल मान रहे हों परन्तु वैसा है नहीं जैसा कि दिखता है। इसमें दाल में काला कुछ जरूर है कि सरधना के भाजपा विधायक संगीत सोम अवश्य ही फायर ब्रांड भाजपाई नेता हैं लेकिन वह इतने मंदबुद्धि भी नहीं हैं कि पार्टी लाइन के खिलाफ अपनी जुबान खोल लें। जब योगी जी ने ताज महल को निकाल फेंक कर गोरखपुर को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट मानकर तरजीह दी तो संगीत सोम को लगा यही पार्टी लाइन है ओर उन्होंने योगी जी के रास्ते पर ही दो कदम और आगे चलकर बयान दे डाला। उनका बयान देते ही अवकाश बिता रहे विपक्षी खासकर सपा के आजम खान और औवैसी को मौका मिल गया। फिर क्या छिड़ गई बहस। दोनों ओर से जमकर बयानबाजी हुई। जिसको जो समझ में आया वो कहा। लेकिन अचानक चली गई चाल से भाजपा को नुकसान होता नजर आया। यही नहीं ताज की बात होते ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सरकार पर दबाव बनने लगा। तब सरकार हरकत में आई और आनन-फानन में इस मसले को सुलटाने के लिए भाग-दौड़ शुरू कर दी गई।
बच्चे ने की शरारत और घर के बड़ों ने उसे डांट-फटकार कर मामला शांत करने वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए सीएम योगी को संकटमोचक का रोल दे दिया गया। मन में बहुत कसमसाए तो होंगे योगी जी, क्योकि वे खुद ही सबसे बड़े फायरब्रांड नेता है, एक हाथ में माला तो एक हाथ में भाला, तुम एक मारोगे तो हम दस मारेंगे, तुम हमारी एक लडक़ी को भगाओगे तो हम तुम्हारी 100 लड़कियों को...? विचारधारा वाले भगवा नेता हैं। मन में कसमसाहट को लेकर बैक फुट पर आकर आह ताज से वाह ताज करने का निश्चय किया।
बच्चे ने की शरारत और घर के बड़ों ने उसे डांट-फटकार कर मामला शांत करने वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए सीएम योगी को संकटमोचक का रोल दे दिया गया। मन में बहुत कसमसाए तो होंगे योगी जी, क्योकि वे खुद ही सबसे बड़े फायरब्रांड नेता है, एक हाथ में माला तो एक हाथ में भाला, तुम एक मारोगे तो हम दस मारेंगे, तुम हमारी एक लडक़ी को भगाओगे तो हम तुम्हारी 100 लड़कियों को...? विचारधारा वाले भगवा नेता हैं। मन में कसमसाहट को लेकर बैक फुट पर आकर आह ताज से वाह ताज करने का निश्चय किया।
मोदी का ये नया मेंटास जिंदगी वाला स्टंट
गुजरात चुनाव की टीआरपी में भाजपा सबसे ऊपर
आप सभी टीवी देखते होंगे तो एक विज्ञापन मेंटास जिंदगी वाला तो आपने देखा होगा कि साधारण जिंदगी में जो मात खाता है वहीं मेंटास जिंदगी यानी अपनी दिमागी चाल से कैसे ऐश करता है। वही चाल हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी चल रहे हैं। राहुल भैया गुजरात की गलियों में खाक छान कर लोगों को जातिवाद और पंथवाद और पार्टी वाद पर रिझाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं पीएम नरेन्द्र मोदी ने बड़ौदा को एक फोल काल करके वहां रहने वाले भाजपा कार्यकर्ता गोपालभाई से बात करके चंद घंटों में उसे पूरा इंडिया का हीरो बना दिया। इससे अब प्रत्येक गुजराती नागरिक के मन में गोपालभाई के प्रति मोदी की हमदर्दी का प्रभाव पड़ा होगा। यह खबर साधारण सी है कि एक भाजपा के वरिष्ठ नेता ने अपने कार्यकर्ता से बातचीत कर उसे कांग्रेस के बहकावे में न आकर भाजपा के कार्यकलापों को जारी रखने का संदेश देना है लेकिन आजकल मीडिया और सोशल मीडिया का इतना प्रभाव है कि बड़ोदरा के स्टेशनरी की दुकान चलाने वाले गोपालभाई चंद पल में हीरो बन गए। एक गुजराती को हीरो बनाकर पीएम मोदी ने अपने गुजराती भाइयों को दिल से जोड़ लिया है, जो उनका वोट बैँक बनेंगे और यही वोट बैंक भाजपा की नैया पार लगाएगा। इसमें किसी तरह का संदेह नहीं है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस बार गुजरात में मोदी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। क्योंकि केन्द्र की मोदी सरकार की जीएसटी व नोटबंदी, इनकम टैक्स की सख्ती आदि ऐसे फैसले हैं जो व्यापारियों के खिलाफ जा रहे हैं। यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज स्वयं स्वीकारी है कि जीएसटी का असली लाभ मिडिल क्लास को मिलने वाला है। उन्होंने परोक्ष रूप से कहा कि जीएसटी के चलते बाजार और व्यापारियों में कड़ी प्रतिस्पर्धा होगी और व्यापारी अपना माल बेचने के लिए कम से कम लाभ पर सौदा करना पसंद करेंगे। इससे व्यापारियें को नहीं मिडिल क्लास के खरीददार को फायदा होगा। जीएसटी और नोटबंदी को लेकर चुनावी सर्वे भी मोदी सरकार के खिलाफ अपनी राय दे रहे हेँ ऐसे में पिछले 20 वर्षों से राज्य में काबिज भाजपा की सरकार को पुन: सत्ता में लाना मोदी और उसकी केन्द्र की सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। यदि भाजपा हार जाती है तो निश्चित रूप से 2019 के आम चुनाव में विपरीत असर पड़ सकता है। यही बात मान कर राहुल गांधी अपनी पार्टी के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं।मोदी ने मेंटास जिंदगी वाला दांव इसीलिए चला है ताकि लोगों का असल मुद्दों से ध्यान हट जाए और लोग इमोशनल होकर भाजपा और मोदी को जिता दें। गुजरात में भाजपा के साथ एक बात और यह है कि वहां का कोई ऐसा बड़ा चेहरा नहीं है जिसे भाजपा आगे करके उसके नाम पर वोट मांग सके। 2014 से 2017 तक के तीन साल के कार्यकाल में गुजरात ही ऐसा राज्य है जहां तीन-तीन मुख्यमंत्री सरकार चला रहे हैँ। ऐसे अस्थिर सरकार से हुई खामियों का खामियाजा और असंतुष्ट भाजपाइयों का असर कहां जाएगा। इसलिए मोदी ने इन चुनावों में किसी चेहरे को आगे करने की जगह खुद को आगे किया है।
Wednesday, 25 October 2017
...तो ये था मोदी का गुजरात में धोबीपछाड़ दांव
13 दिन चुनाव तिथियां इसीलिए टाली गई थीं
गुजरात में विधानसभा चुनाव की तिथियां चुनाव आयोग ने स्वयं नहीं टाली गईं जैसी कि आशंका थी, ठीक वैसा ही हुआ। मोदी और रूपानी सरकार को रेवडिय़ां बांटने का मौका देने के लिए थोड़ी देर के लिए चुनाव आयोग ने शेषन के जमाने के आयोग का चोला ओढ़ लिया था। लेकिन जैसे ही चुनाव तिथियों की घोषणा हुई वैसे ही सच्चाई सामने आ गई। कुलदीप नैय्यर ने अपने आलेख में चुनाव आयोग पर संदेह की बात कही है, जो बात पूरी तरह से सच साबित हो रही है। जैसा कि चुनाव आयोग ने गुजरात में चुनाव तिथियां हिमाचल विधानसभा की चुनाव तिथियों के साथ घोषित न किए जाने की अपनी विवशता बताई थी। गुजरात में बाढ़ एवं पुनर्वास का कार्य पूर्ण न हो पाने के कारण चुनाव आयोग ऐसा न कर सका। इस पर दो पूर्व चुनाव आयुक्त ने अपनी सख्त टिप्पणी दी। एक पूर्व चुनाव आयुक्त ने कहा कि बाढ़ राहत का कार्य अधिकारी करते हैं न कि राजनीतिज्ञ और एक पखवाड़े के अंदर होने वाले दो राज्यों की विधानसभा के चुनाव की तिथियां एक साथ ही घोषित की जानी चाहिएं भले ही वहां चुनाव एक पखवाड़े के अंदर कराए जाएं। चुनाव आयोग की इन बातों का मतलब देश की जनता आसानी से निकाल रही है। उसे सब मालूम है कि गुजरात की चुनाव तिथियां क्यों नहीं घोषित की जा सकीं थी। अब क्यों हुई?चुनाव आयोग ने बुधवार को विवादों और आरोपों के बाद गुजरात चुनावों का कार्यक्रमों की घोषणा कर दी है , जिसके अनुसार 9 और 14 दिसम्बर को दो चरणों में मतदान कराये जायेंगे और 18 दिसम्बर को नतीजे घोषित होंगे । इसके तुरंत बाद से राज्य में चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है यानी अब सरकार किसी भी नई योजना की घोषणा नहीं कर सकेगी। हिमाचल के चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा 12 अक्टूबर को की गई थी जिसके 13 दिन बाद गुजरात की तारीख़ों का ऐलान किया गया। इस बीच आरोप लगे कि चुनाव आयोग जान-बूझकर देरी कर रहा है ताकि नरेंद्र मोदी को बड़ी योजनाओं की घोषणा करने का समय मिल जाए। 12 अक्टूबर से 25 अक्टूबर के बीच कई बड़ी सरकारी योजनाओं का ऐलान किया भी गया। मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने 16 अक्टूूबर को किसानों को तीन लाख रुपए तक का कर्ज़ बिना ब्याज के देने का ऐलान किया था जिससे सरकार पर 700 करोड़ रुपए का भार पडऩे का अनुमान है। ड्रिप सिंचाई के उपकरणों पर 18 प्रतिशत जीएसटी का पूरा भार अब सरकार उठाएगी।
गुजरात सरकार पाटीदार आंदोलन के दौरान पटेल समुदाय के लोगों पर दर्ज किए मुक़दमे ख़त्म करने का फ़ैसला लिया है। पाटीदार समुदाय से जुड़े ओमिया माताजी संस्थान को ऊंझा में पर्यटन सेवाओं के विकास के लिए आर्थिक मदद देने की घोषणा की है। मां वात्सल्य योजना का लाभ अब तक 1.5 लाख रुपए सालाना कमाने वाली महिलाओं को मिलता था लेकिन अब ये सीमा बढ़ाकर 2.5 लाख की गई। कांट्रेक्ट पर काम करने वाली महिला कर्मियों के लिए 90 दिनों का मातृत्व अवकाश देने की घोषणा की गई। आशा कार्यकर्ताओं का वेतन 50 फ़ीसदी बढ़ाया गया।
उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने नगरपालिका कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग का फ़ायदा और आईटीआई के कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी और साथी सहायक शिक्षक (शिक्षामित्र) का वेतन 10500 रुपए प्रति महीने से बढ़ाकर 16222 रुपए किया था. विद्या सहयाकों का वेतन 16500 से बढ़ाकर 25000 किया गया. चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन में भी वृद्धि की गई. सरकार ने ठेके पर काम कर रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए 11 दिन की कैज़ुअल छुट्टी देने,काम के दौरान दुर्घटना में मौत होने पर परिजनों को दो लाख रुपए मुआवज़ा देने का ऐलान किया। सरकार ने इन कर्मचारियों को ढाई सौ रुपए का यात्रा भत्ता भी देने की घोषणा की है.
बड़ी योजनाओं का ऐलान
मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने 16 अकटूूबर को 900 करोड़ के प्रोजेक्टों का उद्घाटन किया था। गुजरात सरकार ने अहमदाबाद शहर में साढ़े छह हज़ार करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले मेट्रो प्रोजेक्ट के दूसरे चरण को भी मंज़ूरी दे दी है। गुजरात सरकार ने अहमदाबाद के रिंग रोड पर टोल टैक्स ख़त्म कर दिया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी वडोदरा यात्रा के दौरान 100 करोड़ रुपए के सिटी कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, 160 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले ट्रांसपोर्ट हब प्रोजेक्ट, 125 करोड़ की जनमहल सिटी ट्रांसपोर्ट हब योजना, 267 करोड़ की लागत से बनने वाले वेस्ट टू एनर्जी सेंटर जैसी योजनाओं का शिलान्यास किया या घोषणा की। मोदी ने 6 करोड़ के वेटरनिटी हॉस्पिटल, 265 करोड़ के दो फ्लाइओवर, 166 करोड़ के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का भी ऐलान किया।
वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि गुजरात सरकार ने चुनावों की घोषणा में हुई देरी का पूरा फ़ायदा उठाया है और समाज के कई वर्गों को आकर्षित करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि भाजपा सरकार ने समाज के असंतुष्ट या असंगठित वर्गों को लुभाने की कोशिशें की हैं। सरकार ने रविवार को भी कैबिनेट की बैठक कर कई योजनाओं का ऐलान किया है। ऐसे में सरकार ने मतदाताओं को रिझाने की हर मुमकिन कोशिश की है।
इसे शुद्ध राजनीतिक बेमानी कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी क्योंकि सरकार से बाहर के लोग मतदाताओं को किसी तरह से रिझाते हैं तो उन पर उंगलियां उठ सकती हैं। ऐसे में राहुल गांधी कितना चमत्कार दिखा सकते हैं ये तो वक्त ही बताएगा।
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